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अंकों के दंश तले जीवन-बोध से रिक्त होती पीढ़ी : शिक्षा, संवेदना, सभ्यता और समकालीन संकट

प्राचीन प्रकाश, आधुनिक आवश्यकता और मनुष्य होने की शाश्वत चेतना

अंक नहीं, जीवन का सार: शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार, लेखक : डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान

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ज्ञानवर्धक : अंकों के दंश तले जीवन-बोध से रिक्त होती पीढ़ी : शिक्षा, संवेदना, सभ्यता और समकालीन संकट

Abhyuday Bharat News / Sun, May 3, 2026 / Post views : 76

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अंकों के दंश तले जीवन-बोध से रिक्त होती पीढ़ी :

शिक्षा, संवेदना, सभ्यता और समकालीन संकट

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )

प्रस्तावना

जब शिक्षा संख्या में सिमट जाती है, तब मनुष्य अनुभव से रिक्त होने लगता है। जहाँ शिक्षा का केंद्र मनुष्य से हटकर मात्र मापन बन जाता है, वहाँ सभ्यता धीरे-धीरे भीतर से शुष्क होने लगती है।

“सा विद्या या विमुक्तये।” - विष्णु पुराण

(वही विद्या है जो मुक्त करे।)

समकालीन शिक्षा-व्यवस्था में अंक सफलता के पर्याय बन चुके हैं। मानो मनुष्य की समस्त प्रतिभा, क्षमता और संभावनाएँ कुछ संख्याओं में बाँधी जा सकती हों। परंतु प्रश्न यह है कि क्या अंकों की यह अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा वास्तव में जीवन की गुणवत्ता, सृजनशीलता, संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीयता का विकास करती है?

आज की पीढ़ी जिस दबाव, असुरक्षा, तुलना और मानसिक तनाव से गुजर रही है, वह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के क्षरण का संकेत है। प्रस्तुत आलेख शिक्षा, समाज, मनोविज्ञान, दर्शन, अर्थनीति, तकनीक और सभ्यता-दृष्टि के आलोक में अंक-केंद्रित व्यवस्था की बहुआयामी समीक्षा करता है।

1. शिक्षा में अंकों की प्रधानता : संकुचित दृष्टि का विस्तार

आज शिक्षा का मूल्यांकन लगभग पूर्णतः अंकों पर आधारित है। विद्यालयों से लेकर प्रतिष्ठित संस्थानों तक प्रवेश और उन्नयन के अधिकांश द्वार प्रतिशत, मेरिट और श्रेणीक्रम से नियंत्रित होते हैं।

एक समय था जब साठ प्रतिशत अंक सम्मानजनक उपलब्धि माने जाते थे; आज वही औसत से भी न्यून समझे जाते हैं। यह परिवर्तन केवल मानकों का नहीं, मानसिकता का भी द्योतक है।

सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि विद्यार्थियों की प्रतिभा, जिज्ञासा, समझ, कल्पना और भविष्य का मूल्यांकन भी इन्हीं अंकों की संकीर्ण कसौटी पर किया जाने लगा है।

“अंकों में जीवन नहीं होता, जीवन में अंक होते हैं।” जब साधन ही लक्ष्य बन जाए, तब शिक्षा अपना आत्मबोध खो देती है।

2. प्रतिभा का कृत्रिम मानदंड : कबीर से आधुनिक युग तक

यदि अंक ही सफलता के अंतिम मानदंड होते, तो कबीर, तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद, श्रीनिवास रामानुजन, लता मंगेशकर, थॉमस एडिसन, बिल गेट्स, मार्क जकरबर्ग और ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्व इतिहास में अपना स्थान न बना पाते।

इन विभूतियों की शक्ति प्रमाणपत्रों में नहीं, बल्कि मौलिक चिंतन, जिज्ञासा, साहस, परिश्रम और सृजनशीलता में निहित थी।

आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोध इंगित करते हैं कि दीर्घकालीन उपलब्धि में धैर्य, उद्देश्य-बोध, भावनात्मक संतुलन और सतत अभ्यास की भूमिका निर्णायक है।

“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।” - ऋग्वेद

(हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएँ।)

प्रतिभा प्रायः पाठ्य-पुस्तक के बाहर जन्म लेती है और अनुशासन से विकसित होती है।

3. कोचिंग संस्कृति और अवसर की असमानता :

आज अनेक प्रवेश परीक्षाएँ विद्यालयी शिक्षा की अपेक्षा कोचिंग-आधारित तैयारी पर अधिक निर्भर हो चुकी हैं। परिणामतः शिक्षा अवसर का नहीं, संसाधनों का खेल बनती जा रही है।

एक ओर वातानुकूलित कोचिंग-कक्ष हैं, दूसरी ओर मिट्टी के आँगन में दीपक तले पढ़ता विद्यार्थी। यह दृश्य केवल आर्थिक विषमता नहीं, बल्कि अवसरों के विभाजन का दर्पण है।

ग्रामीण, निर्धन और सीमांत क्षेत्रों के विद्यार्थी इस दौड़ में अदृश्य रूप से पीछे धकेल दिए जाते हैं। जिनके पास धन, महानगर, साधन और विशेष मार्गदर्शन है, उनके लिए सफलता का पथ अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

यूनेस्को सहित अनेक वैश्विक अध्ययनों ने शिक्षा में सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के प्रभाव को रेखांकित किया है।

जब दौड़ आरंभ होने से पहले ही पथ असमान हों, तब विजय प्रतिभा की नहीं, परिस्थिति की होती है।

4. मनोवैज्ञानिक दबाव और मौन त्रासदी :

प्रतिस्पर्धा की यह अति बालकों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को भीतर से तोड़ रही है।

अनेक विद्यार्थी केवल औसत अंकों से नहीं, बल्कि जीवन की व्यापकता से भी दूर हो जाते हैं। उनका प्रत्येक दिन अपेक्षाओं, तुलना, भय और असफलता की आशंका में व्यतीत होता है।

भावनाएँ, रुचियाँ, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व-विकास क्रमशः उपेक्षित होते जाते हैं। अनेक मुस्कुराते चेहरे भीतर से मौन संघर्ष लड़ रहे होते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने किशोर मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक प्राथमिकता का विषय माना है।

“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” — अमृतबिंदु उपनिषद

(मनुष्य के बंधन और मुक्ति-दोनों का कारण मन ही है।)

यदि मन टूट जाए, तो अंक भी जीवन को नहीं संभाल सकते।

5. अभिभावकीय महत्त्वाकांक्षाएँ और बाल्यकाल का हरण :

अनेक अभिभावक अपनी अधूरी इच्छाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा की आकांक्षाओं को बच्चों पर आरोपित कर देते हैं।

बालक उनके लिए संवेदनशील व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उपलब्धि अर्जित करने की परियोजना बन जाते हैं। प्रत्येक परीक्षा युद्ध बन जाती है, प्रत्येक परिणाम प्रतिष्ठा का प्रश्न, और प्रत्येक असफलता अपमान का कारण।

यह प्रवृत्ति बाल-मन की स्वाभाविकता को नष्ट करती है। “बच्चे ईश्वर का सबसे कोमल संगीत हैं, उन्हें मशीन मत बनाइए।” - रवीन्द्रनाथ टैगोर

बाल्यकाल वह ऋतु है जहाँ स्वतंत्रता से व्यक्तित्व अंकुरित होता है; भय से नहीं।

6. तकनीक, डिजिटल तुलना और नई पीड़ा :

समकालीन युग में प्रतिस्पर्धा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं रही। सामाजिक माध्यमों पर अंक, रैंक, चयन और उपलब्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन बच्चों और युवाओं पर अतिरिक्त दबाव निर्मित करता है।

अब बच्चों का मूल्यांकन केवल कक्षा में नहीं, स्क्रीन पर भी होने लगा है l दूसरों की सफलता की निरंतर दृश्यता व्यक्ति को अपने जीवन से असंतुष्ट बना सकती है।

डिजिटल युग ने अवसर दिए हैं, परंतु तुलना की गति भी बढ़ा दी है। अब असफलता केवल निजी अनुभव नहीं, सार्वजनिक अनुभूति बन जाती है।

जहाँ तुलना निरंतर हो, वहाँ संतोष दुर्लभ हो जाता है।

7. शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य : विवेक, नैतिकता और सृजन

शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि मनुष्य-निर्माण है l वह व्यक्ति को प्रश्न करना, तर्क करना, सत्य की खोज करना, असहमति प्रकट करना, करुणा रखना और समाज के प्रति उत्तरदायी बनना सिखाती है।

यदि शिक्षा को केवल संख्यात्मक होड़ तक सीमित कर दिया जाए, तो स्वतंत्र चिंतन, नवाचार और संवेदनशील समाज की संभावना क्षीण हो जाती है।

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।” - बृहदारण्यक उपनिषद

(अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।)

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि शिक्षा तथ्यों का संग्रह नहीं, विचार करने का प्रशिक्षण है।

8. राष्ट्रनिर्माण और शिक्षा का प्रश्न :

किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों की दीवारों पर नहीं, वहाँ बैठी पीढ़ियों के मन में लिखा जाता है।

यदि वहाँ केवल रटने वाले मस्तिष्क तैयार होंगे, तो समाज में अनुकरण बढ़ेगा; यदि वहाँ विचारशील मन तैयार होंगे, तो सभ्यता आगे बढ़ेगी।

ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक नवाचार, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक परिपक्वता-इन सबका मूल शिक्षा है।

अतः शिक्षा नीति केवल प्रशासनिक विषय नहीं, राष्ट्र की आत्मा और भविष्य का प्रश्न है।

9. प्रवेश नीति में समावेशिता की आवश्यकता :

यदि शिक्षा केवल विशिष्ट वर्ग की पहुँच में रखनी हो, तो वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है। किंतु यदि उद्देश्य ‘सबको अवसर, सबके लिए शिक्षा’ है, तो मूल्यांकन-पद्धति में व्यापक सुधार अनिवार्य है।

प्रश्नपत्रों को पाठ्यक्रम-आधारित, विश्लेषणात्मक, समग्र और बहुआयामी बनाया जाना चाहिए।

साक्षात्कार, परियोजना-कार्य, सृजनशीलता, सामाजिक संवेदना और समस्या-समाधान क्षमता को भी मूल्यांकन में उचित स्थान मिलना चाहिए।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के अध्ययन भविष्य-कौशलों में आलोचनात्मक चिंतन और सहयोग को अत्यावश्यक मानते हैं।

10. जीवन-कौशल और व्यवहारिक गुणों की उपेक्षा :

जीवन में सफलता केवल अंकों से निर्धारित नहीं होती। समस्या-समाधान, सहयोग, नेतृत्व, संप्रेषण-कौशल, नैतिकता, धैर्य, अनुकूलनशीलता और रचनात्मक दृष्टि-ये वे गुण हैं जो व्यक्ति को सफल और सार्थक बनाते हैं।

दुर्भाग्यवश वर्तमान परीक्षा-प्रणाली इनका समुचित आकलन नहीं कर पाती।

“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” — भगवद गीता (ज्ञान से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं।)

“मनुष्य की पहचान उसके गुणों से होती है, ग्रेड से नहीं।” — स्वामी विवेकानंद

11. प्रकृति से विच्छेद और अनुभवहीन ज्ञान

आज अनेक बच्चे पुस्तकों में पृथ्वी पढ़ते हैं, पर मिट्टी को छू नहीं पाते; विज्ञान पढ़ते हैं, पर आकाश को निहारने का अवकाश नहीं पाते।

ज्ञान जब अनुभव से कट जाता है, तब वह सूचना तो बनता है, बुद्धि नहीं। प्रकृति से संवाद, श्रम से परिचय और जीवन से साक्षात्कार भी शिक्षा के अनिवार्य आयाम हैं।

12. निष्कर्ष

अंकों की अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा में हम बाल्यकाल की निष्कलुषता, संबंधों की ऊष्मा, संवेदनाओं की गहराई और जीवन की विविधता खोते जा रहे हैं।

यदि शिक्षा को पुनः जीवनोन्मुख, न्यायपूर्ण और मानवतावादी बनाना है, तो अंकों की भूमिका को पुनर्परिभाषित करना होगा। शिक्षा वह हो जो ज्ञान दे, पर साथ ही करुणा भी; दक्षता दे, पर साथ ही विवेक भी; सफलता दे, पर साथ ही मनुष्यता भी।

“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।” - हितोपदेश (विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है।)

यदि आने वाली पीढ़ी को मात्र सफल बनाना है, तो अंक पर्याप्त हैं; किंतु यदि उसे सार्थक, संवेदनशील, विवेकशील और सभ्य बनाना है, तो शिक्षा को पुनः मनुष्यता की ओर लौटना होगा।

अब समय आ गया है कि हम बच्चों को केवल अंक अर्जित करना नहीं, जीवन अर्जित करना सिखाएँ; केवल सफल होना नहीं, श्रेष्ठ मनुष्य होना सिखाएँ।

13. संदर्भ ग्रंथ :

13.1. प्राचीन भारतीय ग्रंथ एवं दार्शनिक स्रोत

ऋग्वेद। समालोचित संस्करण। वाराणसी: चौखंबा विद्या भवन।

बृहदारण्यक उपनिषद्। उपनिषद्-संग्रह। वाराणसी: चौखंबा संस्कृत सीरीज़।

अमृतबिंदु उपनिषद्। उपनिषद्-संहिता। वाराणसी: संस्कृत ग्रंथावली।

भगवद्गीता। गोरखपुर: गीता प्रेस।

हितोपदेश। संस्कृत नीति-साहित्य संस्करण। दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास।

विष्णु पुराण। पुराण-साहित्य संस्करण। वाराणसी: चौखंबा प्रकाशन।

13.2. भारतीय चिंतक एवं साहित्यकार

स्वामी विवेकानंद। शिक्षा, चरित्र और राष्ट्रनिर्माण विषयक व्याख्यान-संग्रह। कोलकाता: अद्वैत आश्रम।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर। शिक्षा। नई दिल्ली: साहित्य अकादेमी।

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। प्रज्वलित मस्तिष्क। नई दिल्ली: पेंगुइन बुक्स इंडिया।

महात्मा गांधी। नई तालीम। अहमदाबाद: नवजीवन प्रकाशन।

जवाहरलाल नेहरू। भारत एक खोज। नई दिल्ली: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।

13.3. वैश्विक चिंतक एवं आधुनिक शिक्षा-विचारक

अल्बर्ट आइंस्टीन। विचार और मत। न्यूयॉर्क: क्राउन प्रकाशन।

जॉन डेवी। लोकतंत्र और शिक्षा। न्यूयॉर्क: मैकमिलन।

पाउलो फ्रेरे। पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र। न्यूयॉर्क: कॉन्टिन्यूअम।

हॉवर्ड गार्डनर। मन की संरचनाएँ: बहु-बौद्धिकता का सिद्धांत। न्यूयॉर्क: बेसिक बुक्स।

डैनियल गोलमैन। भावनात्मक बुद्धिमत्ता। न्यूयॉर्क: बैंटम बुक्स।

13.4. अंतरराष्ट्रीय संस्थागत प्रतिवेदन एवं शोध स्रोत

यूनेस्को। वैश्विक शिक्षा अनुश्रवण प्रतिवेदन 2023। पेरिस: यूनेस्को प्रकाशन।

विश्व स्वास्थ्य संगठन। किशोर मानसिक स्वास्थ्य प्रतिवेदन। जिनेवा: डब्ल्यूएचओ।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन। शिक्षा और कौशल का भविष्य 2030। पेरिस: ओईसीडी प्रकाशन।

यूनिसेफ। विश्व के बच्चों की स्थिति प्रतिवेदन। न्यूयॉर्क: यूनिसेफ।

13.5. समकालीन भारतीय परिप्रेक्ष्य एवं नीति-दस्तावेज

भारत सरकार। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020। नई दिल्ली: शिक्षा मंत्रालय।

परीक्षा तनाव, छात्र मानसिक स्वास्थ्य, कोचिंग संस्कृति, सामाजिक असमानता तथा मूल्यांकन-पद्धति पर आधारित समकालीन शोध-पत्र, संपादकीय लेख एवं राष्ट्रीय प्रतिवेदन।

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