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अंक नहीं, जीवन का सार: शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार, लेखक : डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान

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बिलासपुर न्यूज़ : अंक नहीं, जीवन का सार: शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार, लेखक : डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान

Abhyuday Bharat News / Sat, May 2, 2026 / Post views : 93

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✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )

“अंक जीवन की पुस्तक का केवल एक पृष्ठ हैं—सम्पूर्ण कथा नहीं।” — डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम

“शिक्षा का ध्येय केवल जीविका नहीं, जीवन है।”

प्रस्तावना

परीक्षा-परिणाम घोषित होने का दिन केवल संख्याओं का दिन नहीं होता; वह अनेक घरों की आशाओं, आशंकाओं और संवेदनाओं का भी दिन होता है। कहीं उल्लास का प्रकाश फैलता है, कहीं मौन की छाया उतर आती है; कहीं प्रशंसा के स्वर सुनाई देते हैं, तो कहीं किसी विद्यार्थी का आत्मविश्वास भीतर ही भीतर टूट जाता है। कुछ अंकों की अधिकता किसी छात्र को प्रतिभाशाली सिद्ध कर देती है, और कुछ अंकों की न्यूनता किसी अन्य को साधारण मान लिया जाता है

यह स्थिति जितनी सामान्य प्रतीत होती है, उतनी ही गंभीर भी है। क्या सचमुच मनुष्य का मूल्य संख्याओं से निर्धारित किया जा सकता है? क्या संवेदना, जिज्ञासा, कल्पना, चरित्र, नैतिकता, नेतृत्व और करुणा को अंकसूची में समेटा जा सकता है?

आज की शिक्षा-व्यवस्था में अंक सफलता का प्रमुख प्रतीक बन चुके हैं। विद्यालय की प्रतिष्ठा, परिवार की अपेक्षाएँ, सामाजिक सम्मान तथा भविष्य की संभावनाएँ प्रायः इन्हीं अंकों से जोड़ी जाती हैं। परंतु शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण कराना नहीं, अपितु मनुष्य को विचारशील, विवेकवान, सृजनशील, सह-अस्तित्वशील और जीवनोपयोगी बनाना है।

मुंडक उपनिषद का वचन है—

“सा विद्या या विमुक्तये।” अर्थात् वही विद्या है जो मनुष्य को बंधनों से मुक्त करे।

यदि शिक्षा भय, तुलना और आत्महीनता का कारण बन जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से विमुख हो जाती है। अतः समय की आवश्यकता है कि शिक्षा को पुनः मानव-केंद्रित, मूल्य-केंद्रित और जीवन-केंद्रित दृष्टि से देखा जाए।

1. अंक : मापदंड, साधन या भ्रम?

अंक शिक्षा-प्रणाली का एक प्रशासनिक साधन हैं। वे कुछ शैक्षिक दक्षताओं का सीमित आकलन करते हैं। परंतु जब उन्हें अंतिम सत्य मान लिया जाता है, तभी समस्या आरम्भ होती है।

एक परीक्षा स्मरण-शक्ति, समय-प्रबंधन और तात्कालिक प्रदर्शन को माप सकती है, पर वह किसी विद्यार्थी की कल्पनाशीलता, साहस, संघर्षशीलता, नैतिकता, नेतृत्व-क्षमता अथवा भविष्य की संभावनाओं का पूर्ण मूल्यांकन नहीं कर सकती।

इतिहास साक्षी है कि अनेक व्यक्तित्व ऐसे हुए जिन्होंने पारंपरिक शिक्षा में असाधारण अंक प्राप्त नहीं किए, किंतु मानव सभ्यता को नई दिशा दी। अल्बर्ट आइंस्टीन, थॉमस एडिसन, रवींद्रनाथ टैगोर आदि उदाहरण प्रमाण हैं कि प्रतिभा का मार्ग सदैव अंकतालिका से होकर नहीं गुजरता।

जीन पियागेट और लेव वायगोत्स्की ने शिक्षा को बहुआयामी प्रक्रिया माना, जिसमें बौद्धिक विकास के साथ सामाजिक और भावनात्मक विकास भी सम्मिलित है।

अतः अंक उपयोगी हैं, किंतु अंतिम नहीं; सहायक हैं, किंतु सम्पूर्ण नहीं।

2. शिक्षा और सामाजिक असमानता

प्रत्येक विद्यार्थी समान परिस्थितियों से परीक्षा-कक्ष में प्रवेश नहीं करता। किसी के पास उत्तम विद्यालय, निजी मार्गदर्शन, डिजिटल संसाधन और शांत वातावरण है; तो किसी के पास सीमित साधन, पारिवारिक दायित्व और संघर्षपूर्ण जीवन-परिस्थितियाँ।

पियरे बॉर्डियू ने “सांस्कृतिक पूँजी” की अवधारणा द्वारा स्पष्ट किया कि परिवार और समाज से प्राप्त संसाधन भी सफलता को प्रभावित करते हैं।

इस प्रकार अनेक बार अंक प्रतिभा से अधिक अवसरों की कहानी कहते हैं। न्यायपूर्ण शिक्षा वही है जो परिणाम से पहले अवसरों की समानता सुनिश्चित करे।

3. मनोवैज्ञानिक दृष्टि : क्षमता स्थिर नहीं होती

कैरोल ड्वेक की विकासोन्मुख मानसिकता की अवधारणा बताती है कि बुद्धिमत्ता स्थिर नहीं, विकसित होने वाली क्षमता है। जो विद्यार्थी असफलता को अंत नहीं, शिक्षा का एक चरण मानते हैं, वे आगे बढ़ते हैं।

एंजेला डकवर्थ ने अपने शोधों में दीर्घकालिक धैर्यपूर्ण प्रयास को सफलता का महत्त्वपूर्ण आधार बताया है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल श्रेष्ठ विद्यार्थियों की पहचान करना नहीं, बल्कि प्रत्येक छात्र में निहित श्रेष्ठता को जागृत करना है।

4. मानसिक स्वास्थ्य : एक मौन संकट

आज अनेक विद्यार्थी परिणाम से अधिक अपेक्षाओं के दबाव से टूटते हैं। चिंता, अनिद्रा, अवसाद, आत्महीनता और सामाजिक भय शिक्षा-जगत के मौन संकट बन चुके हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने किशोर मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक प्राथमिकता माना है।

यदि कोई व्यवस्था ज्ञान देने से पहले भय देना आरम्भ कर दे, तो उसके स्वरूप पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। विद्यालयों में परामर्श-सेवा, संवादशील वातावरण और असफलता के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं।

5. भावनात्मक बुद्धिमत्ता और मानवीय कौशल

डैनियल गोलेमैन ने स्पष्ट किया कि जीवन में सफलता केवल बौद्धिक क्षमता पर निर्भर नहीं करती। आत्मनियंत्रण, सहानुभूति, सहयोग, निर्णय-क्षमता और भावनात्मक संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं।

विद्यालय यदि केवल स्मरण-शक्ति को पुरस्कृत करें और संवेदनशीलता की उपेक्षा करें, तो वे कुशल परीक्षार्थी तो बना सकते हैं, पर पूर्ण मनुष्य नहीं।

तैत्तिरीय उपनिषद का संदेश है— “सत्यं वद। धर्मं चर।” अर्थात् सत्य बोलो और धर्ममय आचरण करो।

6. सृजनात्मकता, नवाचार और भविष्य

इक्कीसवीं शताब्दी में केवल जानकारी का संग्रह पर्याप्त नहीं, नवाचार की क्षमता अधिक महत्त्वपूर्ण है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था के युग में रटकर अर्जित ज्ञान शीघ्र अप्रासंगिक हो जाता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था— “कल्पना ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”

भविष्य उन्हीं विद्यार्थियों का है जो प्रश्न पूछते हैं, प्रयोग करते हैं, असफल होकर पुनः उठते हैं और नये समाधान गढ़ते हैं। अतः शिक्षा का केंद्र केवल स्मृति नहीं, कल्पना और सृजन होना चाहिए।

7. नैतिकता, नागरिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व

यदि उच्च अंक प्राप्त व्यक्ति भ्रष्ट, असंवेदनशील या सामाजिक रूप से गैर-जिम्मेदार बन जाए, तो शिक्षा का मूल्य क्या रह जाता है?

एक आदर्श शिक्षा-व्यवस्था विद्यार्थियों में सत्यनिष्ठा, अनुशासन, सहिष्णुता, लोकतांत्रिक चेतना, पर्यावरणीय संवेदना और राष्ट्रहित की भावना विकसित करती है। विद्यालय केवल व्यवसाय-निर्माण केंद्र नहीं, उत्तरदायी नागरिक निर्माण केंद्र होने चाहिए।

महा उपनिषद का वचन है— “वसुधैव कुटुम्बकम्।”

8. भारतीय दृष्टि : शिक्षा का आंतरिक अर्थ

भागवद गीता का संदेश है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात् मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। शिक्षा भी यही सिखाती है—प्रयास करो, सीखो, विकसित होओ; परिणाम अपने समय पर आएँगे।

हमारे परंपरागत वचन “विद्या ददाति विनयम्” का अर्थ है कि सच्ची शिक्षा विनम्रता देती है, अहंकार नहीं।

9. अभिभावकों और समाज के लिए संदेश

बच्चों को प्रेरणा चाहिए, तुलना नहीं; विश्वास चाहिए, भय नहीं; दिशा चाहिए, दबाव नहीं।

हर बालक अद्वितीय है। कोई विज्ञान में उत्कृष्ट होगा, कोई कला में, कोई खेल में, कोई नेतृत्व में, कोई सेवा में, कोई उद्यम में। शिक्षा का कार्य सबको एक साँचे में ढालना नहीं, बल्कि प्रत्येक को उसकी प्रकृति के अनुरूप विकसित करना है।

परिवार यदि परिणाम से अधिक प्रयास को महत्व देगा, तो बच्चे टूटेंगे नहीं—निखरेंगे।

10. नई शिक्षा दिशा

शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 बहुविषयी अध्ययन, कौशल-विकास, आलोचनात्मक चिंतन, मातृभाषा, अनुभवात्मक अधिगम और समग्र मूल्यांकन पर बल देती है।

यह संकेत है कि भारत परीक्षा-केंद्रित मॉडल से जीवन-केंद्रित मॉडल की ओर अग्रसर है।

11. निष्कर्ष : अंक नहीं, जीवन का सार है

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अंकों को उनका उचित स्थान दें—न अधिक, न कम। अंक उपयोगी हैं, पर निर्णायक नहीं; सहायक हैं, पर सम्पूर्ण नहीं। वे द्वार खोल सकते हैं, पर जीवन नहीं बना सकते; वे अवसर दे सकते हैं, पर उद्देश्य नहीं दे सकते।

मनुष्य की वास्तविक सफलता उसके चरित्र, श्रम, संवेदना, जिज्ञासा, धैर्य, सृजनशीलता, आत्मसम्मान, सामाजिक योगदान और आंतरिक संतुलन में निहित है।

बृहदारण्यक उपनिषद की प्रार्थना आज भी हमारा मार्ग आलोकित करती है—

“असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्माऽमृतं गमय।”

अर्थात् असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, सीमितता से अमर मूल्य की ओर ले चलो। यही शिक्षा का शाश्वत ध्येय है।

अंक कागज़ पर लिखे जाते हैं,

पर जीवन का इतिहास चरित्र पर अंकित होता है।

विद्यालय से निकलने वाला छात्र तभी सफल है,

जब वह केवल बुद्धिमान नहीं,

बल्कि विवेकवान, संवेदनशील और सच्चा मनुष्य हो।

12.संदर्भ सूची

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। विंग्स ऑफ फायर। नई दिल्ली: यूनिवर्सिटीज प्रेस, 1999।

जाँ पियाजे। बुद्धि का मनोविज्ञान। लंदन: रूटलेज, 1950।

लेव वाइगोत्स्की। समाज में मन: उच्च मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का विकास। कैम्ब्रिज: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1978।

पियरे बोरदियू। डिस्टिंक्शन: रुचि-निर्णय की सामाजिक समीक्षा। कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984।

कैरोल ड्वेक। माइंडसेट: सफलता का नया मनोविज्ञान। न्यूयॉर्क: रैंडम हाउस, 2006।

एंजेला डकवर्थ। ग्रिट: जुनून और धैर्य की शक्ति। न्यूयॉर्क: स्क्रिब्नर, 2016।

डेनियल गोलमैन। भावनात्मक बुद्धिमत्ता। न्यूयॉर्क: बैंटम बुक्स, 1995।

विश्व स्वास्थ्य संगठन। किशोर मानसिक स्वास्थ्य प्रतिवेदन। जिनेवा: डब्ल्यूएचओ, नवीन संस्करण।

यूनेस्को। वैश्विक शिक्षा अनुश्रवण प्रतिवेदन। पेरिस: यूनेस्को, नवीन संस्करण।

विश्व आर्थिक मंच। भविष्य के रोजगार प्रतिवेदन। जिनेवा: डब्ल्यूईएफ, 2025।

भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020। नई दिल्ली: भारत सरकार, 2020।

श्रीमद्भगवद्गीता। गोरखपुर: गीता प्रेस, प्रामाणिक संस्करण।

मुण्डकोपनिषद्। वाराणसी: प्रामाणिक संस्कृत-हिंदी संस्करण।

तैत्तिरीयोपनिषद्। वाराणसी: प्रामाणिक संस्कृत-हिंदी संस्करण।

बृहदारण्यकोपनिषद्। वाराणसी: प्रामाणिक संस्कृत-हिंदी संस्करण।

अथर्ववेद। नई दिल्ली: प्रामाणिक संस्कृत-हिंदी संस्करण।

महाउपनिषद्। वाराणसी: प्रामाणिक संस्कृत-हिंदी संस्करण।

जॉन ड्यूई। लोकतंत्र और शिक्षा। न्यूयॉर्क: मैकमिलन, 1916।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर। शिक्षा। कोलकाता: विश्वभारती, विविध संस्करण।

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