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: बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, निलंबन की अवधि होगी ड्यूटी का हिस्सा

Admin / Tue, Mar 25, 2025 / Post views : 220

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छत्तीसगढ़। बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग के निलंबन संबंधी आदेश को खारिज कर दिया है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए आदेश को असंवैधानिक बताते हुए कर्मचारियों के साथ भेदभाव की स्थिति को स्पष्ट किया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया कि निलंबन की अवधि को कर्मचारियों के कर्तव्य की अवधि के रूप में माना जाएगा, जिससे उन कर्मचारियों को राहत मिली जो निलंबित थे और वेतन की रिकवरी का सामना कर रहे थे।क्या था मामला? यह मामला रायगढ़ वन मंडल में कार्यरत फॉरेस्टर दिनेश सिंह राजपूत का था, जिन्हें 2 जुलाई 2019 को निलंबित कर दिया गया था। आरोप था कि उन्होंने प्रशासनिक प्रक्रिया में गड़बड़ी की और तथ्यों को छिपाया। दिनेश सिंह ने राज्य सरकार के निलंबन आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, यह दावा करते हुए कि अन्य कर्मचारियों पर समान आरोप लगे थे, लेकिन उन्हें कम दंड दिया गया। जबकि, दिनेश सिंह की सैलरी का 100% रिकवरी और तीन वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट का फैसला:   हाई कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कुछ समान मामलों का संदर्भ लिया। कोर्ट ने माना कि निलंबन की अवधि को ड्यूटी के समय के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और यह कर्मचारियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कर्मचारियों के साथ समान और निष्पक्ष व्यवहार किया जाना चाहिए।   सरकार का आदेश था भेदभावपूर्ण: याचिकाकर्ता ने बताया कि उनके जैसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी समान आरोप थे, लेकिन उन्हें कठोर दंड के बजाय कम सजा दी गई थी। कुछ कर्मचारियों पर केवल सैलरी रिकवरी और एक वेतन वृद्धि रोकने का दंड लगाया गया, जबकि दिनेश सिंह पर पूरी सैलरी की रिकवरी और तीन वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण माना और इसे खारिज कर दिया। क्या है सुप्रीम कोर्ट का निर्णय? हाई कोर्ट ने इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि समान मामलों में भिन्न-भिन्न दंड देना संविधान के तहत असंवैधानिक है। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार को सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

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