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छत्तीसगढ़ न्यूज़ : करोड़ों की शासकीय जमीन को प्लॉट बनाकर बेच दिया, सालों से खेले जा रहे खेल की अब राजस्व मंत्री ने मांगी है जानकारी…

Abhyuday Bharat News / Mon, Jun 1, 2026 / Post views : 115

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खैरागढ़ में सरकारी जमीन का ऐसा खेल सामने आया है, जिसने शासकीय रिकॉर्ड, राजस्व व्यवस्था और वर्षों से चल रही रजिस्ट्रियों की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन जमीनों को सरकारी दस्तावेजों में एडवर्ड पार्क, छोटे झाड़ का जंगल, सार्वजनिक उपयोग की भूमि बताया गया, उन्हीं जमीनों को प्लॉट में तब्दील कर करोड़ों रुपये में बेच दिया गया। अब जब जांच रिपोर्ट सामने आई है तो शहर में एक ही चर्चा है, आखिर इतने साल तक सिस्टम सोता रहा या सब कुछ देखकर भी आंखें मूंदे रहा?

पूरा मामला खैरागढ़ के खसरा नंबर 114, 115, 169 और 170 से जुड़ा है। संयुक्त जांच प्रतिवेदन में इन जमीनों के स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी मात्रा में जमीन की खरीदी-बिक्री हुई, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में भूमि का स्वरूप सामान्य निजी जमीन जैसा नहीं बताया गया था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल में जमीन की कीमत ने भी कई रंग बदले।

सूत्र बताते हैं कि मूल विक्रेता ने कई हिस्से लगभग दो से तीन हजार रुपये प्रति वर्गफीट की दर से बेचे थे। इसके बाद बिचौलिये मैदान में उतरे और वही जमीन सात से आठ हजार रुपये प्रति वर्गफीट तक पहुंच गई। यानी सरकारी रिकॉर्ड चाहे जो कहते रहे, लेकिन बाजार में जमीन सोने की तरह बिकती रही।

जानकारी के अनुसार, जब रियासतकालीन जमीनों का रिकॉर्ड तैयार हुआ तब कई जमीनों का प्रकार तो सरकारी, सार्वजनिक उपयोग या जंगल मद में दर्ज किया गया, लेकिन मेंटेनेंस खसरों के स्वामित्व कॉलम में तत्कालीन राजपरिवार के नाम बने रहे। धीरे-धीरे यही कॉलम असली मालिकाना हक की तरह इस्तेमाल होने लगा और यहीं से शुरू हुआ करोड़ों की जमीनों का खेल।

कानूनी जानकार भी मानते हैं कि केवल मेंटेनेंस खसरे में नाम दर्ज होने से पूर्ण स्वामित्व सिद्ध नहीं हो जाता। कई न्यायिक टिप्पणियों में भी यह कहा गया है कि राजस्व रिकॉर्ड या खसरा प्रविष्टियां अपने आप मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं होतीं। यानी सवाल अब और बड़ा हो गया है, यदि जमीन का मूल स्वरूप सरकारी या सार्वजनिक उपयोग का था तो फिर वर्षों तक रजिस्ट्री, नामांतरण और निर्माण कार्य किस आधार पर होते रहे?

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने भी स्पष्ट किया है कि संबंधित भूमि का कोई स्वीकृत ले-आउट नहीं था। जांच में बिना अनुमति भूमि विभाजन और उपविभाजन की बात सामने आई है। इसके बावजूद जमीन के टुकड़े हुए, रजिस्ट्रियां हुईं, लोगों ने मकान बनाए और करोड़ों रुपये का कारोबार चलता रहा। यही वजह है कि अब लोगों का गुस्सा केवल जमीन बेचने वालों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर है।

शहर में छोटे-छोटे मामलों में जंगल मद और राजस्व नियमों का हवाला देकर निर्माण रोक दिया जाता है, लेकिन यहां करोड़ों रुपये की जमीन पर सालों तक सब कुछ चलता रहा और किसी विभाग को कुछ गलत दिखाई नहीं दिया।

मामला शासन स्तर तक पहुंचा

यह मामला अब शासन स्तर तक पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने साफ कहा है- “मामले से संबंधित शिकायत और जांच प्रतिवेदन मुझे उपलब्ध कराइए। यदि जांच में अनियमितता सामने आई है, तो मैं यह जानकारी लूंगा कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। पूरे प्रकरण की समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।”

राजस्व मंत्री का यह बयान आते ही अब पूरा मामला और गर्मा गया है। शहर में चर्चा है कि यदि जांच सचमुच गहराई तक गई तो सवाल सिर्फ जमीन बेचने वालों तक सीमित नहीं रहेंगे। जांच की आंच उन दफ्तरों तक भी पहुंच सकती है, जहां से रजिस्ट्री गुजरती है, नामांतरण होते हैं और सरकारी रिकॉर्ड बदलते हैं।

फिलहाल, खैरागढ़ में एक ही सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है, अगर जमीन सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और जंगल थी, तो करोड़ों के प्लॉट आखिर किस भरोसे पर बिकते रहे? और अगर सब कुछ वैध था, तो अब जांच क्यों हो रही है? इन्हीं सवालों के जवाब तय करेंगे कि यह मामला रिकॉर्ड की गलती है, प्रशासनिक लापरवाही है या फिर सरकारी जमीनों पर दशकों तक चलता रहा ऐसा खेल, जिसकी परतें अब खुलनी शुरू हुई हैं।

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#CG NEWS

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