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रायपुर : : मिट्टी से गढ़ी सफलता की नई इबारत

Abhyuday Bharat News / Thu, May 14, 2026 / Post views : 113

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बासनपाली की मालती कुंभकार बनीं ‘लखपति दीदी’

बिहान, माटी कला बोर्ड और सरकारी योजनाओं के संगम से बदली ग्रामीण महिला की जिंदगी

बासनपाली की मालती कुंभकार बनीं ‘लखपति दीदी’

कहते हैं कि यदि हुनर को सही मंच और सरकारी योजनाओं का साथ मिल जाए, तो सफलता की कहानी खुद-ब-खुद लिखी जाती है। रायगढ़ जिले के तमनार विकासखंड के ग्राम बासनपाली की मालती कुंभकार ने इसे सच कर दिखाया है। मिट्टी की पारंपरिक कला को आधुनिकता से जोड़कर वे आज न केवल एक आत्मनिर्भर उद्यमी हैं, बल्कि प्रदेशभर में महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं।

पारंपरिक चाक से आधुनिक तकनीक तक का सफर
    मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के निर्देश पर आयोजित सुशासन तिहार के दौरान मालती ने अपनी संघर्षपूर्ण कहानी साझा की। पहले वे पुराने लकड़ी के चाक से दीये और हांडी बनाती थीं। सीमित संसाधनों के कारण न तो उत्पादन बढ़ पा रहा था और न ही आर्थिक स्थिति सुधर रही थी। मालती ने अपने एकता महिला स्व-सहायता समूह को बिहान कार्यक्रम से जोड़ा। माटी कला बोर्ड और हस्तशिल्प बोर्ड के सहयोग से उन्हें इलेक्ट्रॉनिक चाक और आधुनिक प्रशिक्षण मिला, जिसने उनके काम की गति और गुणवत्ता दोनों बदल दी।

उत्पादों में विविधता और बाजार तक पहुंच
    अब मालती केवल पारंपरिक बर्तन ही नहीं, बल्कि बाजार की मांग के अनुरूप आधुनिक मिट्टी के उत्पाद तैयार कर रही हैं। आर्टिस्टिक प्रोडक्ट्स के रूप में मिट्टी के कुकर, कढ़ाई, पानी की बोतल, कप-प्लेट, सजावटी पॉट और देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं बनाने लगी है। उन्होंने अपने कार्य विस्तार के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से क्रमशः 30 हजार, 80 हजार और 1 लाख रुपये का ऋण लिया और उसे व्यवसाय में निवेश किया।
     आज वे प्रदेश के प्रमुख मेलों (सरस मेला, हस्तशिल्प मेला आदि) में अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं। राज्यव्यापी पहचान के कारण रायपुर से लेकर जगदलपुर तक, प्रदेश के लगभग हर जिले में उनके उत्पादों की भारी मांग है।

लखपति दीदी के रूप में नई पहचान
     मालती कुंभकार आज व्यक्तिगत रूप से और अपने समूह के माध्यम से लखपति दीदी के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने बताया कि शासन की योजनाओं से न केवल उनकी आय बढ़ी, बल्कि उनमें वह आत्मविश्वास भी आया कि वे बड़े मंचों पर जाकर अपनी कला का विक्रय कर सकें। मेलों के दौरान शासन द्वारा उनके ठहरने और भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की जाती है, जो कलाकारों के लिए एक बड़ा सहारा है।

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