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ABN NEWS :- ऑटो : क्या EV पूरी तरह से क्लीन एनर्जी? जानें क्यों उड़ रही इस दावे की धज्जियां...

Abhyuday Bharat News / Mon, Mar 2, 2026 / Post views : 176

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इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लगने वाली बैटरी बनाने के लिए जिन चीजों का इस्तेमाल हो रहा है, उसने दुनिया की सर्वाधिक गंदी सप्लाई चेन को जन्म दिया है। बैटरी बनाने की यह पूरी व्यवस्था एक तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के क्लीन होने के दावे की धज्जियां उड़ा रही है

electric vehicle

इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर उठने लगे सवाल

हिमाचल प्रदेश के बर्फीले इलाके में दो मोर दिखे हैं। इसके बाद जलवायु परिवर्तन को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हुई है, लेकिन ग्लोबल लीडर्स के बीच इस मुद्दे को लेकर जितनी गंभीरता दिखनी चाहिए, वह अभी तक नहीं दिखी है। और तो और, डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति पद संभालने के बाद वैश्विक महाशक्ति अमेरिका इस मुद्दे को लेकर लापरवाह हो गया है। वैसे, कॉरपोरेट वर्ल्ड की ओर से जलवायु परिवर्तन को लेकर लोगों की फिक्र को भुनाने की कोशिश जरूर जारी है, जिसमें सरकारें भी शामिल हैं। इसका औजार बनाया गया है इलेक्ट्रिक गाड़ियों को। इसे जलवायु परिवर्तन रोकने के एक इंस्ट्रूमेंट के तौर पर पेश किया गया। कहा गया कि इलेक्ट्रिक गाड़ियां इंसानी सभ्यता की इस चुनौती को खत्म कर देंगी। क्या सचमुच ऐसा है? इस दावे की सचाई क्या है?

इसमें कोई शक नहीं है कि इलेक्ट्रिक क्लीन एनर्जी है, लेकिन यह इन गाड़ियों में लगने वाली बैटरी से बनती हैं। इन्हें बनाने के लिए जिन कच्चे माल की जरूरत होती है, उनकी माइनिंग से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। फिर इनकी माइनिंग के लिए मजदूरों का शोषण भी हो रहा है। जर्नलिस्ट निकोलस निआरकोस (Nicolas Niarchos) ने ‘The Elements of Power: A Story of War, Technology, and the Dirtiest Supply Chain on Earth,’ नाम की किताब में इसी पहलू पर रोशनी डाली है। वह बताते हैं कि डेमोक्रेटिक रिपबल्कि ऑफ कांगो से लेकर इंडोनेशिया में इन बैटरियों को बनाने के लिए जिस कोबाल्ट और निकेल की माइनिंग हो रही है, उससे पर्यावरण को किस कदर नुकसान पहुंच रहा है।

क्लीन एनर्जी के दावे की उड़ रही धज्जियां

किताब में निकोलस बताते हैं कि इन देशों में माइनिंग से वहां की धरती किस तरह से तबाह हो रही है। हरे-भरे इलाके उजाड़े जा रहे हैं। पानी के स्रोत प्रदूषित किए जा रहे हैं। निकोलस यह भी लिखते हैं कि कहीं-कहीं इन खनिजों की माइनिंग के लिए बाल मजदूरी भी करवाई जा रही है। जहां कांगो और इंडोनेशिया जैसे देश पर्यावरण की कीमत पर ये काम कर रहे हैं, वहीं चीन इसका असल फायदा उठा रहा है। वह इन खनिजों की प्रॉसेसिंग कर रहा है और अपने यहां के इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों को मजबूत भी। निकोलस का दावा है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लगने वाली बैटरी बनाने के लिए जिन चीजों का इस्तेमाल हो रहा है, उसने दुनिया की सर्वाधिक गंदी सप्लाई चेन को जन्म दिया है। वह यह भी लिखते हैं कि बैटरी बनाने की यह पूरी व्यवस्था एक तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के क्लीन होने के दावे की धज्जियां उड़ा रही है।

जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी बढ़ी

निकोलस किताब में जापान के लिथियम आयन बैटरी इनोवेशन और चीन के साइकल से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बाजार में दबदबा बनाने के बारे में भी बताते हैं। वह लिखते हैं कि चीन ने यह दबदबा भारी सब्सिडी और लचीली औद्योगिक नीति की बदौलत हासिल किया है। इसी वजह से आज चीन की BYD दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक गाड़ी कंपनी बन गई है। बेशक, चीन अपनी नीतियों के दम से इस उद्योग में बाकी देशों से आगे निकलने में कामयाब हुआ है, लेकिन उसके इस लालच की वजह से बड़ी संख्या में मजदूर बुरी परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। यही नहीं, इससे जियो-पॉलिटिकल टेंशन भी बढ़ी है। निकोलस ने 1970 के दशक के ऑयल क्राइसिस को आज खनिजों के पीछे भागने की होड़ से जोड़ा है। उन्होंने किताब में दिखाया है कि किस तरह से नीतियां और तकनीक मिलकर धरती को नुकसान पहुंचा रही हैं, भले ही यह सोच-समझकर न किया गया हो। निकोलस ने नीति-निर्माताओं और निवेशकों से इस सचाई को समझकर समय रहते सुधार लाने की अपील की है।

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