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दिल्ली न्यूज़ : मोटरसाइकिल के बदले आधा पाकिस्तान', सैम बहादुर ने 9 गोलियां लगने पर कहा था- किसी गधे ने लात मार दी...

Abhyuday Bharat News / Fri, Apr 3, 2026 / Post views : 136

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भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का आज जन्म दिवस है। उनके नेतृत्व में ही 1971 की जंग में भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की थी। उनके ही कारण तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान टूटकर बांग्लादेश के नाम से अलग देश बना। जानें 'सैम बहादुर' से जुड़े खास फैक्ट्स।

नई दिल्ली: हिंदुस्तान के एक ताकतवर और मजबूत सेना प्रमुख, जिन्होंने पाकिस्तान को इतनी करारी शिकस्त दी थी कि अगले कुछ दशक आवाज तक नहीं निकाल पाया। अटूट नेतृत्व क्षमता और प्रेरणादायी साहस वाले इस लीडर की ही ताकत थी, जिसने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया था और इस मुल्क को दो हिस्सों में बांटकर बांग्लादेश बनाया। बात हो रही है भारत के महान सैन्य अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ 

की।

सैम मानेकशॉ के वो जोशीले शब्द

'इस देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी है। आपको लड़ना होगा, जीतने के लिए लड़ना होगा। हारने के लिए यहां कोई जगह नहीं है। अगर हारे तो वापस आने की जरूरत नहीं। हार देश का अपमान होगा।' सैम मानेकशॉ के ये जोशीले शब्द उनकी अटूट नेतृत्व क्षमता और दृढ़ संकल्प को दर्शाते हैं।वे अपनी ताकत और साहस को पहले भी दिखा चुके थे, लेकिन 1971 में उन्हें फिर से एक अवसर मिला, जिसमें सैम मानेकशॉ ने जीत भारत के नाम कराई।

1914 में हुआ जन्म, डॉक्टर बनने का था सपना

  • 3 अप्रैल 1914 को पंजाब के अमृतसर में हुआ सैम मानेकशॉ का जन्म

  • इनका पूरा नाम 'सैम होरमूजजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ' था

  • फौज से लेकर उनके दोस्त और परिवार के सदस्य उन्हें या तो सैम पुकारते थे या ' सैम बहादुर '

  • 'सैम बहादुर' में न सिर्फ देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी, बल्कि अपने सैनिकों में जीत का जज्बा भर देने की अद्भुत क्षमता भी थी

  • सैम मानेकशॉ का पिता की तरह डॉक्टर बनने का सपना था

  • उम्र अभी कम थी, लेकिन जुनून भरपूर था और इसीलिए उन्होंने पिता के सामने अपनी इच्छा रख दी

  • हालांकि, पिता ने उम्र का हवाला देते हुए लंदन में मेडिकल की पढ़ाई करने से इनकार कर दिया था

फिर ऐसे हुई सेना में एंट्री

सैम मानेकशॉ मायूस जरूर थे, लेकिन अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में पढ़ाई करते हुए किस्मत उनकी जिंदगी को नई दिशा दे रही थी। 1932 में आईएमए में अफसरों की भर्ती के लिए आवेदन आए थे। इस बार सैम अपने पिता की बात न मानते हुए सेना में जाने का मन बना चुके थे। वे आईएमए में सिलेक्ट हुए और कड़ी ट्रेनिंग के बाद लाहौर में ड्यूटी पर जा चढ़े। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वे अपने पराक्रम और बहादुरी का उदाहरण पेश कर चुके थे। उनकी शरारतों और मजाक के कई किस्से आज भी मशहूर हैं।

दूसरे विश्वयुद्ध में लगी थी 9 गोलियां

कुछ इसी तरह का एक किस्सा साल 1942 का है, जब दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्मा की लड़ाई में जापानी सैनिकों की 9 गोलियों को सैम मानेकशॉ ने अपने शरीर पर झेला था। हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर ने उनके पेट में लगी गंभीर चोटों और उनके बचने की बहुत कम संभावना को देखते हुए उनका इलाज करने से मना कर दिया था। किसी तरह उनकी सांसें चल रही थी। बाद में जब सर्जरी शुरू हुई थी, तब पता चला था कि शरीर के कई अंग बुरी तरह जख्मी हो चुके थे। इसी कारण उन्हें होश में आने में कई घंटे लग चुके थे।

तब मानेकशॉ ने मूंछों पर ताव देकर कह दी बड़ी बात

जब सैम मानेकशॉ को होश आया, तो सर्जन ने पूछा, 'तुम्हें क्या हुआ है, नौजवान?' और घायल मानेकशॉ ने जवाब दिया, 'कुछ नहीं, बस किसी गधे ने मुझे लात मार दी।' इतने भयानक दर्द को भी हंसी में उड़ा देने वाले यह सैम मानेकशॉ ही थे। उनकी जिंदगी का एक किस्सा यह भी है कि बड़ी-बड़ी मूंछों वाले सैम अपने बच्चों के साथ खूब शरारत किया करते थे। वे बच्चों को खूब परेशान किया करते थे। इस बारे में उनकी बेटी माया दारूवाला ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था।

याह्या खान और सैम मानेकशॉ एक समय थे दोस्त

सैम बहादुर ne सिर्फ एक युद्ध नहीं जीता था, बल्कि आधा पाकिस्तान अलग कर दिया था। इसमें भी दिलचस्प किस्सा उनकी मोटरसाइकिल का भी है। कभी एक समय दोस्त बनकर रहने वाले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान को सैम की मोटरसाइकिल पसंद थी, क्योंकि हिंदुस्तान के बंटवारे से पहले दोनों एक ही फौज में हुआ करते थे, तो दोस्ती पक्की बन चुकी

 थी।

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद कैसे भारत आए सैम

जब देश का बंटवारा हुआ तो याह्या खान ने पाकिस्तान की फौज में जाने का फैसला लिया था। मानेकशॉ के पास भी पाकिस्तान जाने का एक अवसर था, क्योंकि वे पारसी समुदाय से आते थे और अन्य पारसी की तरह उन्हें पाकिस्तान में बसने का अवसर मिला था। दूसरी बात यह भी कि देश विभाजन के दौरान सेना भी बंट चुकी थी, जो 12वीं फ्रंटियर फोर्स राइफल्स में मानेकशॉ थे, वह पाकिस्तान के हिस्से जा चुकी थी। इसके बावजूद, मानेकशॉ ने भारत को चुना, क्योंकि उनका दिल हिंदुस्तान के लिए धड़कता था।

मोटरसाइकिल के बदले आधा पाकिस्तान! जानें वो किस्सा

देश विभाजन के समय मानेकशॉ ने अपनी मोटरसाइकिल एक हजार रुपए में याह्या खान को बेच दी, लेकिन उसका पैसा बकाया था। याह्या खान यह कहकर मोटरसाइकिल ले गए कि वह पैसे भिजवा देंगे, लेकिन ढाई दशक तक वह पैसा नहीं आया। हालांकि, जब भारत-पाकिस्तान की लड़ाई हुई तो मानेकशॉ और याह्या खान अपने-अपने देश की सेना के प्रमुख थे। इस लड़ाई में भारत विजयी हुआ। सैम मानेकशॉ ने जीत के बाद कहा था, 'मैंने याह्या खान के चेक का 24 सालों तक इंतजार किया, लेकिन वह कभी नहीं आया। आखिर उन्होंने 1947 में लिया गया उधार अपना आधा देश देकर चुकाया।'

एक निडर और बेखौफ सेना प्रमुख

सैम मानेकशॉ निडर और बेखौफ थे। इसीलिए जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब वे उनकी बात काटने में भी नहीं डरते थे। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वे मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई करें, लेकिन सैम मानेकशॉ ने ऐसा करने से इनकार किया, क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी। भले इंदिरा गांधी इस बात से नाराज थीं, लेकिन मानेकशॉ अपनी तैयारी से भली भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने इंदिरा गांधी को जीत की गारंटी देते हुए समय मांग लिया था। इसी तैयारी का नतीजा था कि भारतीय फौज ने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था।

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