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ABN NEWS :- देश दुनिया : 'वो गोरखा है मौत से नहीं डरता'...कारगिल में पाकिस्तान के छुड़ाए पसीने, बालेन शाह के नेपाल के 40,000 बहादुर इंडियन आर्मी

Abhyuday Bharat News / Sat, Apr 25, 2026 / Post views : 171

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गोरखाओं ने 200 से ज्यादा साल से निष्ठा, विशिष्टता और बहादुरी के साथ भारतीय सेना में रहकर देश की सेवा की है। उन्होंने चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों के दौरान दुश्मन को छठी का दूध याद दिलाया था।

गोरखाओं के आते ही युद्ध की तस्वीर बदल जाती है। भारत, ब्रिटेन और नेपाल की आर्मी में ये बहादुर गोरखा शामिल हैं। इनके बारे में भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था-यदि कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है। आज भारत की सेना में करीब 32,000 से लेकर 40,000 तक गोरखा हैं। इन्हीं गोरखाओं के बारे में टिम गुरुंग ने एक किताब लिखी है-'आयो गोरखाली: ए हिस्ट्री ऑफ गुरखाज'। ये गोरखा जिस नेपाल से आते हैं, वहां इन दिनों 35 साल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार है, जो 100 रुपये से ज्यादा भारतीय वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रहे हैं।


कारगिल युद्ध में पाकिस्तान पर टूट पड़े थे गोरखा

  • गोरखा रेजिमेंट ने 1947-48 का कश्मीर युद्ध हो, 1962 में चीन के खिलाफ जंग हो या 1965, 1971 और 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ हर युद्ध और कठिन अभियानों में अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की है।

  • 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान इन्हीं बहादुर गोरखाओं ने उल्टा चढ़ाई करते हुए पहाड़ों पर मौजूद पाकिस्तानी दुश्मनों को मारा था।

पहले विश्वयुद्ध के दौरान 90 हजार गोरखा लड़े

प्रथम विश्वयुद्ध (1914-19) के दौरान, गोरखा समुदाय के 90,000 से अधिक सैनिकों ने भारत के साथ-साथ फ्लैंडर्स, गैलीपोली, फिलिस्तीन, मिस्र, मेसोपोटामिया और फ्रांस में लड़ाई लड़ी।


गोरखा रेजिमेंट बेहद लड़ाकू और छापामार

  • भारतीय सेना की पहाड़ों की लड़ाई में माहिर और दुश्मन पर घातक वार करने वाले सबसे बहादुर माने जाने वाली गोरखा रेजिमेंट का गठन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 24 अप्रैल 1815 को किया था।

  • गोरखा रेजीमेंट भारतीय सेना की एक महत्वपूर्ण इन्फैंट्री रेजीमेंट है, जो गोरखा सैनिकों से बनी है। गोरखा रेजीमेंट के सैनिक मुख्य रूप से नेपाल के गोरखा क्षेत्र और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से आते हैं।


दुश्मन के खिलाफ आयो गोरखाली का नारा

भारतीय सेना में गोरखाओं का योगदान अतुलनीयहै, जिन्हें उनकी अदम्य बहादुरी, 'जय महाकाली, आयो गोरखाली' के युद्धघोष और कुकरी (Kukri) के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है। गोरखाओं की निष्ठा, अनुशासन और बहादुरी ने उन्हें भारतीय सेना की रीढ़ बना दिया है।

एक संधि के तहत इंडियन आर्मी में होती है भर्ती

  • गोरखा रेजिमेंट का इतिहास एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816) से जुड़ा है, जिसके बाद सुगौली की संधि हुई थी। इसी संधि के तहत गोरखा भारत और ब्रिटेन की सेना में भर्ती होते रहे हैं। ये सैनिक नेपाल और भारत के नेपाली भाषी गोरखा समुदाय से आते हैं।

  • 1947 में एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके बाद नेपाली गोरखा सैनिक ब्रिटेन, भारत और नेपाल की सेनाओं में बाकायदा भर्ती होने लगे थे। इस समझौते के बाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेवा देने वाले गोरखा सैनिकों की स्थिति में बदलाव हुआ। साथ ही गोरखा सैनिकों को ब्रिटेन के साथ भारत की सेनाओं में भी सेवा देने का मौका मिला।

  • 2022 में अग्निवीर (अग्निपथ) स्‍कीम लागू होने के बाद से भारतीय सेना में गोरखा की भर्ती प्रक्रिया थम सी गई है। कहा ये भी जाता है कि जो गोरखा रिटायर हो गए, उनके बाद नए गोरखाओं की भर्ती नहीं की गई है।

परमवीर चक्र से लेकर महावीर चक्र तक वीरता पुरस्कार जीते

  • गोरखा रेजिमेंट ने अब तक कई परमवीर चक्र जीते हैं। 1962 में मेजर धन सिंह थापा और 1999 में लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को परमवीर चक्र मिला था। इसके अलावा, इसे रेजिमेंट ने महावीर चक्र सहित सैकड़ों वीरता पुरस्कार जीते हैं।

  • आजादी के बाद 10 में से 6 गोरखा रेजिमेंट (1, 3, 4, 5, 8, और 9 गोरखा राइफल्स) भारत के पास रहीं और बाद में 11वीं गोरखा राइफल्स का गठन किया गया, जो अब भारतीय सेना की सात गोरखा रेजिमेंटें हैं।

  • गोरखा सैनिकों की 42 हफ्तों की बेहद कठोर ट्रेनिंग होती है। वे पहाड़ों और कठिन इलाकों में युद्ध के लिए माहिर माने जाते हैं। गोरखा सैनिक सियाचिन ग्लेशियर से लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति मिशनों (लेबनान, सूडान, सिएरालियोन) में भी तैनात रहे हैं।

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# International News

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