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ABN NEWS :- देश दुनिया : जब तमाम उम्मीदें कमजोर हो जाती हैं, तब अदालतों से जगती है आस....

Abhyuday Bharat News / Thu, Feb 26, 2026 / Post views : 198

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एनसीईआरटी के साथ वैसे तो पहले भी कई विवाद जुड़ चुके हैं, लेकिन इस बार बात न्यायपालिका की है इसलिए माना जा रहा है कि इस बार तो संस्था बुरी तरह से उलझ गई है।

NCERT की किताबों के कंटेंट को लेकर पहले भी विवाद हो चुके हैं, लेकिन इस बार मामला न्यायपालिका से जुड़ा है। कक्षा 8 की एक किताब में जूडिशरी में करप्शन की बात कही गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम नहीं करने दिया जाएगा। सोर्सेज के हवाले से खबरें हैं कि NCERT इस अंश को हटा सकता है।

Supreme Court

भ्रष्टाचार समस्या

ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल की इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक, करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 182 देशों के बीच भारत की रैंक 91 है। पिछले साल के मुकाबले देश ने 5 अंकों का सुधार जरूर किया, लेकिन भ्रष्टाचार अब भी एक बहुत बड़ी समस्या है। इसकी वजह से तमाम सरकारी योजनाएं और नीतियां अपना असर खो देते हैं और आम लोगों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। हालांकि जब बात जूडिशरी की आती है, तो भावनाएं बदल जाती हैं।

जस्टिस वर्मा केस

देश में न्यायपालिका उन चंद संस्थाओं में है, जिस पर लोग आज भी पूरा भरोसा करते हैं। जब तमाम उम्मीदें कमजोर हो जाती हैं, तब अदालतों से आस जगती है। लेकिन, इस भरोसे की कुछ कीमत भी है और वह है पारदर्शिता व जवाबदेही। कोई भी सिस्टम करप्ट नहीं होता, उसे चलाने वाले चंद लोग ही होते हैं। देश की न्यायिक व्यवस्था को भी इस मामले में कुछ सवाल झेलने पड़े हैं। जस्टिस यशवंत वर्मा के करप्शन का मामला पिछले साल मार्च का है और अभी तक यह अंजाम तक नहीं पहुंचा है। इसी तरह, दिसंबर में ही सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी कि करियर के आखिरी में बड़े फैसले देने का ट्रेंड बढ़ रहा है। जरूरी नहीं कि करप्शन पैसों का ही हो।

लंबित मामले

अदालतें भरोसे का नाम हैं, पर यह भी सच है कि आम आदमी अदालतों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। मुकदमे सालों-साल चलते हैं और खर्चीले हैं। विभिन्न अदालतों में लगभग 4.9 करोड़ केस पेंडिंग हैं। जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक - न्यायाधीशों के तमाम पद खाली हैं, जिससे न्याय की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है।

अच्छी पहल

भारतीय न्यायपालिका की इस मायने में तारीफ होनी चाहिए कि पारदर्शिता के लिए वह खुद पहल करती है। मसलन, पिछले साल मई में शीर्ष अदालत के न्यायधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने पर सहमति जताई थी। इस कदम ने न्यायपालिका की गरिमा को और बढ़ा दिया। सुप्रीम कोर्ट को फिर उसी तरह की पहल करते हुए कोई रास्ता निकालना चाहिए। इस विवाद में सबक NCERT के लिए भी है कि केवल एक संस्था पर बात क्यों, जबकि करप्शन देश की सबसे आम समस्या है।

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