Wed, 16 Sep 2026
Logo

ब्रेकिंग

काशी विद्वत परिषद की प्रथम बैठक संपन्न, नवागढ़ ब्लॉक की कार्यकारिणी गठित

समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान के लिए डॉ. द्वारिका प्रसाद साहू को मानद डॉक्टरेट सम्मान

अंबिकापुर के सड़क की वायरल वीडियो का मुख्यमंत्री ने लिया संज्ञान: कलेक्टर अजीत वसंत से दूरभाष पर की चर्चा

सामाजिक सरोकारों से मानद डॉक्टरेट तक का सफर : डॉ. मनीष कुमार साहू को मिला सम्मान

सतनाम पंथी महोत्सव में मंत्री गुरु खुशवंत साहेब सामने के 400 कलाकार दल हुए शामिल

राम सिंह ठाकुर की गिरफ्तारी की मांग, एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं तो SP कार्यालय घेराव की चेतावनी

काशी विद्वत परिषद की महत्वपूर्ण बैठकआज रविवार को मारो में: अनिल बघेल ABN

निर्माण श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा पर मंथन

प्रधानमंत्री आवास योजना ने लाखों गरीब परिवारों के पक्के घर का सपना किया साकार : केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिं

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान से प्रकृति संरक्षण और मातृ सम्मान का संदेश

सूचना

मौसम: छत्तीसगढ़ में 14 सितंबर तक बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है। ठंडी हवाओं और बूंदाबांदी से मौसम सुहाना हो गया है, वहीं कुछ इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी भी दी गई है

बीजापुर में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली है, जहां नक्सलियों का डंप बरामद कर भारी मात्रा में विस्फोटक जब्त किए गए हैं।

स्कूलों के लिए नई गाइडलाइन जारी की गई है जिसके तहत अब प्रिंसिपलों को भी रोजाना दो पीरियड लेने होंगे

शिक्षा : जब भौतिकी सिमट जाए गणित में : क्या हम सचमुच विज्ञान पढ़ा रहे हैं?

Abhyuday Bharat News / Sun, Aug 2, 2026 / Post views : 379

Share:

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़

शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ

समाचार: अनिल बघेल ABN

1. कक्षा में चल रहा एक मौन परिवर्तन, जिसकी गंभीरता को शिक्षा जगत अब भी पूरी तरह नहीं समझ रहा :

देशभर के विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रतिदिन लाखों विद्यार्थी भौतिकी की कक्षाओं में बैठते हैं। शिक्षक श्यामपट्ट पर सूत्र लिखता है, जटिल व्युत्पत्तियाँ क्रमबद्ध ढंग से समझाता है, विद्यार्थी तेजी से अपनी कॉपियों में प्रत्येक चरण उतारते जाते हैं और निर्धारित समय पर घंटी बज जाती है। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य शैक्षणिक प्रक्रिया प्रतीत होती है। सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है।

लेकिन शिक्षा की सबसे गंभीर समस्याएँ प्रायः वहीं जन्म लेती हैं, जहाँ सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा होता है।

इसी सामान्य दृश्य के भीतर एक असहज प्रश्न छिपा हुआ है - क्या विद्यार्थी वास्तव में विज्ञान को समझ रहे हैं, या वे केवल गणितीय प्रक्रियाओं को दोहराने का अभ्यास कर रहे हैं?

भौतिकी केवल संख्याओं, सूत्रों और समीकरणों का विषय नहीं है। उसका उद्देश्य प्रकृति के नियमों को समझना, घटनाओं के पीछे कार्यरत कारणों को पहचानना और मनुष्य के भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना है। किंतु आज अनेक कक्षाओं में भौतिकी धीरे-धीरे विज्ञान कम और गणित का विस्तार अधिक बनती जा रही है।

विज्ञान समझने की प्रक्रिया है, केवल उत्तर तक पहुँचने की तकनीक नहीं।

2. जब सूत्र बढ़ते जाते हैं और अवधारणाएँ सिकुड़ने लगती हैं :

भौतिकी के अध्यापन में गणित का महत्व निर्विवाद है। गणित के बिना वैज्ञानिक सिद्धांतों की सटीक अभिव्यक्ति संभव नहीं। समस्या गणित में नहीं है। समस्या तब आरंभ होती है, जब गणित विज्ञान की भाषा बने रहने के बजाय स्वयं विज्ञान का स्थान ग्रहण करने लगता है।

आज अनेक कक्षाओं में पूरा अध्याय इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि कौन-सा सूत्र कहाँ प्रयुक्त होगा, कौन-सी व्युत्पत्ति परीक्षा में पूछी जा सकती है और किस प्रकार संख्यात्मक प्रश्न कम समय में हल किया जा सकता है। विद्यार्थी लगातार लिखते रहते हैं। पन्ने भरते जाते हैं। लेकिन अनेक बार मन खाली रह जाता है।

उनके भीतर यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर यह सिद्धांत वास्तविक जीवन की किस घटना को स्पष्ट कर रहा है।

धीरे-धीरे भौतिकी की कक्षा समीकरणों का ऐसा जंगल बन जाती है, जहाँ जिज्ञासा का आकाश सिकुड़ने लगता है।

जब सूत्र केंद्र में आ जाते हैं, तब समझ अक्सर परिधि में चली जाती है।

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन है - शिक्षा का उद्देश्य तथ्यों को याद करना नहीं, बल्कि मन को विचार करने योग्य बनाना है।”

3. जब समझ पीछे हटती है और स्मरणशक्ति आगे आ जाती है :

शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तर देना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। किंतु जब अध्यापन केवल प्रक्रिया-केंद्रित हो जाता है, तब विद्यार्थी “क्यों” और “कैसे” जैसे मूल वैज्ञानिक प्रश्नों से दूर होकर केवल यह सीखते हैं कि कौन-सा सूत्र कहाँ लागू करना है।

कुछ ही सप्ताहों में अनेक विद्यार्थी यह मानने लगते हैं कि भौतिकी उनके लिए अत्यंत कठिन विषय है। कारण विषय की जटिलता नहीं, बल्कि उसका सीमित प्रस्तुतिकरण है। कक्षा में अवधारणा से अधिक गति को महत्व मिलने लगता है। समझ पीछे हटती है और स्मरणशक्ति आगे आ जाती है।

जहाँ समझ कमजोर होती है, वहाँ रटना धीरे-धीरे शिक्षा का विकल्प बन जाता है।

4. विज्ञान की शुरुआत हमेशा प्रश्न से होती है, किसी सूत्र से नहीं :

मानव इतिहास की महान वैज्ञानिक उपलब्धियाँ किसी समीकरण से नहीं, बल्कि एक जिज्ञासा से जन्मी थीं। विज्ञान का पहला कदम प्रश्न है, गणना नहीं।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक शिक्षक रिचर्ड फाइनमैन कहा करते थे - ऐसे प्रश्न अधिक मूल्यवान हैं जिनका उत्तर अभी न हो, बजाय ऐसे उत्तरों के जिन पर प्रश्न ही न किया जा सके।”

यदि विद्यार्थी के भीतर यह प्रश्न ही उत्पन्न नहीं हो रहा कि वस्तुएँ पृथ्वी की ओर क्यों गिरती हैं, प्रकाश का व्यवहार ऐसा क्यों है या ऊर्जा नष्ट क्यों नहीं होती, तो केवल समीकरण हल करने की दक्षता उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं दे सकती।

गणित विज्ञान की भाषा अवश्य है, किंतु भाषा कभी विचार का स्थान नहीं ले सकती।

हर महान खोज की शुरुआत एक प्रश्न से होती है, किसी सूत्र से नहीं।

5. परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था ने विज्ञान को अंक अर्जित करने तक सीमित कर दिया है :

इस समस्या को वर्तमान परीक्षा व्यवस्था ने और अधिक गहरा बना दिया है। अधिकांश मूल्यांकन पद्धतियाँ सूत्रों के प्रयोग, संख्यात्मक हल और तकनीकी प्रक्रियाओं पर आधारित हैं। परिणामस्वरूप शिक्षक भी वही पढ़ाने को प्राथमिकता देते हैं जिससे विद्यार्थी अधिक अंक प्राप्त कर सकें।

परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी प्रायः पूरे अध्याय की अवधारणा समझने के बजाय महत्वपूर्ण सूत्रों की सूची याद करने में अधिक समय लगाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि मूल्यांकन मुख्यतः गणनात्मक उत्तरों पर आधारित है।

और फिर एक समय ऐसा आता है जब प्रयोगशाला बची रहती है, पर जिज्ञासा नहीं; सूत्र बच जाते हैं, पर विज्ञान नहीं।

जब शिक्षा का लक्ष्य केवल अंक बन जाए, तब ज्ञान चुपचाप पीछे छूटने लगता है।

6. यह केवल कक्षा की समस्या नहीं, भविष्य की दिशा का प्रश्न है :

यह केवल भौतिकी शिक्षण की समस्या नहीं है। इसका प्रभाव समाज की वैज्ञानिक संस्कृति पर पड़ता है। जब शिक्षा जिज्ञासा के स्थान पर यांत्रिक दक्षता को प्राथमिकता देने लगती है, तब नवाचार, मौलिक चिंतन और स्वतंत्र अनुसंधान की संभावनाएँ कमजोर होने लगती हैं।

ऐसे विद्यार्थी परीक्षा में सफल अवश्य हो सकते हैं, किंतु वे नए प्रश्न पूछने, स्वतंत्र प्रयोग करने और भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान में मौलिक योगदान देने की क्षमता विकसित नहीं कर पाते।

किसी भी राष्ट्र की वैज्ञानिक प्रगति प्रयोगशालाओं से पहले जिज्ञासु कक्षाओं में जन्म लेती है।

7. भौतिकी को उसके वास्तविक स्वरूप में वापस लौटाना होगा :

यह समझना आवश्यक है कि गणित भौतिकी का विकल्प नहीं है। वह उसका उपकरण है, उद्देश्य नहीं।

एक आदर्श शिक्षक पहले सिद्धांत की सहज व्याख्या करता है, फिर उसे जीवन के अनुभवों और प्रयोगों से जोड़ता है, विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है और उसके बाद गणितीय संरचना प्रस्तुत करता है।

जब समझ पहले आती है, तब गणित बोझ नहीं बनता; वह ज्ञान को गहराई देने वाला माध्यम बन जाता है।

गणित भौतिकी की भाषा है, पर विज्ञान की आत्मा जिज्ञासा है।

8. अब शिक्षा व्यवस्था को स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछना होगा :

क्या हमारी कक्षाएँ भविष्य के वैज्ञानिक तैयार कर रही हैं, या केवल ऐसे विद्यार्थी तैयार कर रही हैं जो सूत्र याद कर लें और परीक्षा में अंक प्राप्त कर सकें?

यदि विज्ञान शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन, तर्कशीलता और जिज्ञासु मन का निर्माण है, तो हमें विज्ञान शिक्षण को उसके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करना ही होगा।

9. निष्कर्ष : जिस दिन कक्षा में प्रश्न समाप्त हो जाते हैं, उसी दिन विज्ञान भीतर से समाप्त होने लगता है :

भौतिकी को केवल गणितीय प्रक्रियाओं तक सीमित कर देना उसके वास्तविक वैज्ञानिक स्वरूप के साथ अन्याय है।

समय आ गया है कि शिक्षक, शिक्षाविद् और नीति-निर्माता इस प्रवृत्ति पर गंभीर पुनर्विचार करें। भौतिकी की कक्षा को केवल सूत्रों और समीकरणों के अभ्यास-कक्ष में बदल देने के बजाय उसे जिज्ञासा, प्रयोग, तर्क और वैज्ञानिक चेतना का केंद्र बनाया जाना चाहिए।

महान वैज्ञानिक गैलीलियो का विचार था - आप किसी व्यक्ति को कुछ सिखा नहीं सकते; आप केवल उसकी सहायता कर सकते हैं कि वह स्वयं उसे खोज सके।”

और शायद शिक्षा की सबसे बड़ी सच्चाई यही है - जिस दिन कक्षा में प्रश्न पूछना बंद हो जाता है, उसी दिन विज्ञान पुस्तकों में तो बचा रहता है, लेकिन मनुष्य के भीतर से धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

10. विचार-स्रोत :

अल्बर्ट आइंस्टीन - शिक्षा के उद्देश्य, स्वतंत्र चिंतन तथा वैज्ञानिक मनोवृत्ति संबंधी विचार।

रिचर्ड फाइनमैन - जिज्ञासा-आधारित अधिगम, प्रश्न संस्कृति तथा विज्ञान शिक्षण संबंधी दृष्टिकोण।

गैलीलियो गैलिली - खोजपरक अधिगम, अनुभवजन्य ज्ञान और वैज्ञानिक अन्वेषण संबंधी विचार।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भारत (2020) - अवधारणात्मक अधिगम, आलोचनात्मक चिंतन तथा अनुभवात्मक शिक्षण पर आधारित शैक्षिक प्रावधान।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा विज्ञान शिक्षण में अवधारणात्मक स्पष्टता, छात्र-केंद्रित शिक्षण तथा अर्थपूर्ण अधिगम की रूपरेखा।

समकालीन विज्ञान शिक्षा विमर्श - परीक्षा-केंद्रित शिक्षण बनाम समझ-आधारित अधिगम पर उभरती शैक्षिक बहसें।

विद्यालयी कक्षाओं के शिक्षण-अनुभव - सूत्रप्रधान अध्यापन, संख्यात्मक प्रश्नों की प्रधानता तथा अवधारणात्मक समझ की व्यवहारिक चुनौतियाँ।

अंतरराष्ट्रीय शिक्षा-दर्शन एवं वैज्ञानिक चिंतन - जिज्ञासा, स्वतंत्र तर्क, नवाचार और खोज-आधारित शिक्षण की अनिवार्यता।

Tags :

#CG NEWS

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

जरूरी खबरें

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

Related Posts