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ABN NEWS :- देश दुनिया : बालेन शाह का 'राष्ट्रवादी कार्ड', लिपुलेख विवाद को फिर हवा देकर क्या जताना चाहता है नेपाल?

Abhyuday Bharat News / Mon, May 4, 2026 / Post views : 178

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नेपाल सरकार ने यह साफ़ कर दिया है कि वह कूटनीतिक माध्यमों से इस मामले को आगे बढ़ाना जारी रखेगी। लेकिन क्या इसका कोई समधाना निकल पाएगा? जवाब देना बहुत मुश्किल है। ये पूरा क्षेत्र रणनीतिक तौर पर इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत यहां अपने सैन्य और नागरिक प्रोजेक्ट्स को और आगे बढ़ाएगा।

lipulekh nepal vs india

काठमांडू: नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे के रास्ते के इस्तेमाल करने को लेकर आपत्ति जताई है। नेपाल ने इस बाबत भारत और चीन दोनों के सामने विरोध दर्ज कराया है। नेपाली विदेश मंत्रालय का कहना है कि हिमालय का यह ऊंचाई वाला दर्रा नेपाली जमीन पर स्थित है और काठमांडू की सहमति के बिना इन दोनों में से किसी भी पड़ोसी देश को इसका इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है।

रविवार को काठमांडू की तरफ से इस बयान के जारी होने के बाद दक्षिण एशिया में एक और क्षेत्रीय विवाद का पन्ना खुल गया है। नेपाल में लिपुलेख को लेकर आम आदमी अब भावनात्मक तौर पर जुड़ चुके हैं और सरकार के लिए ऐसे मुद्दों पर लोगों की भावनाओं के खिलाफ जाना असंभव हो जाता है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि सरकार ने कूटनीतिक माध्यमों से भारत और चीन दोनों का ध्यान अपनी चिंताओं की ओर दिलाया है। उसने यह दोहराया है कि लिपुलेख क्षेत्र नेपाल का अभिन्न अंग है और दोनों देशों से आग्रह किया है कि वे वहां किसी भी तरह की गतिविधि करने से बचें। इसीलिए सवाल ये है कि आखिर नेपाल की तरफ से सख्त प्रतिक्रिया क्यों दी गई है इसे जानने के लिए करीब 200 साल पहले चलना होगा।

भारत-नेपाल में किया गया सुगौली की संधि क्या है?

नेपाल की सख्त प्रतिक्रिया के पीछे 1816 में किया गया सुगौली की संधि है। 1816 की सुगौली संधि के साथ एंग्लो-नेपाल युद्ध खत्म हुआ था और इस क्षेत्र का नक्शा फिर से बनाया गया था। इस संधि के तहत काली नदी जिसे महाकाली भी कहा जाता है उसे नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में स्थापित किया गया। 1990 के दशक से नेपाल का लगातार यही रुख रहा है कि इस नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है और इसलिए उस उद्गम स्थल के पूर्व में स्थित सारी जमीन, जिसमें कालापानी और लिपुलेख भी शामिल हैं नेपाल की है। ये तीनों क्षेत्र मिलकर पश्चिमी हिमालय के एक ऐसे हिस्से को कवर करते हैं जो रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और नेपाल, भारत और तिब्बत के मिलन बिंदु पर स्थित है।

लिपुलेख विवाद पर आगे क्या हो सकता है?

नेपाल सरकार ने यह साफ कर दिया है कि वह कूटनीतिक माध्यमों से इस मामले को आगे बढ़ाना जारी रखेगी। लेकिन क्या इससे कोई नतीजा निकलेगा? इसका जवाब शायद संभव नहीं है क्योंकि ये पूरा क्षेत्र रणनीति और चीन के लिहाज से इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यहां भारत के प्रोजेक्ट्स और तेज ही होंगे। भले नेपाल कितना भी विरोध करे। लेकिन नेपाल का विरोध अपनी जगह पर कायम हैसिद्धांत रूप में दृढ़, व्यवहार में अनसुलझा, और हिमालय जितना ही जटिल।

नई दिल्ली का तर्क है कि इस नदी का असली उद्गम स्थल और भी पूर्व में लिपुखोला सहायक नदी के पास स्थित है। ऐसा होने पर कालापानी और लिपुलेख नेपाली क्षेत्र से बाहर हो जाएंगे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों ने चीनी सीमा पर नजर रखने के लिए कालापानी घाटी में चौकियां स्थापित कीं और वे वहां से कभी नहीं हटे। दशकों बीतने के साथ-साथ यह क्षेत्र 'विवादित' से बदलकर केवल 'प्रशासित' क्षेत्र बन गया। भारत इसे अपना क्षेत्र मानता रहा जबकि नेपाल ने वर्षों तक इस मामले पर चुप्पी बनाए रखी। लेकिन केपी शर्मा ओली ने इस मुद्दे को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने की सोची। आरोप है कि ऐसा उन्होंने चीन के इशारे पर किया।

Kailash Mansarovar Yatra  2026

2020 में ओली ने भड़काया सीमा विवाद

मई 2020 में भारत और नेपाल के बीच पहली बार सीमा विवाद तेजी से भड़का। इसकी वजह बनी भारत के सीमा सड़क संगठन (BRO) की तरफ से बनाई गई 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन जो उत्तराखंड के धारचूला को सीधे लिपुलेख दर्रे से जोड़ती है। नई दिल्ली ने इस सड़क को एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्धि के तौर पर पेश किया। एक ऐसी उपलब्धि जिससे कैलाश मानसरोवर के तीर्थयात्रियों की यात्रा आसान होगी और चीनी सीमा तक रणनीतिक संपर्क मजबूत होगा। काठमांडू के लिए यह एक बहुत बड़ी उकसाने वाली कार्रवाई थी। तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली इससे भड़क उठे और भारत के सामने औपचारिक तौर पर विरोध दर्ज कराया।

ओली की सरकार ने इस समय भारतीय राजदूत को तलब किया और कुछ ही दिनों के भीतर नेपाल का एक नया आधिकारिक राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। इस नक्शे में लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को स्पष्ट रूप से नेपाल की सीमाओं के भीतर दिखाया गया था। यह नक्शा महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था। नेपाल की संसद ने जून 2020 में इसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया जिससे ये नई सीमाएं देश के कानूनी ढांचे का हिस्सा बन गईं और क्षेत्रीय दावे का मुद्दा प्रभावी रूप से एक संवैधानिक मामला बन गया।

भारत की प्रतिक्रिया भी तेज और दो-टूक थी। नई दिल्ली ने इस नक्शे को "एकतरफा कार्रवाई" करार दिया और नेपाल के रुख को ऐतिहासिक रूप से बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया और जोर देकर कहा कि उसकी गतिविधियां पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र के भीतर हैं। लेकिन इन सबसे साथ दो देश जिनका सदियों का इतिहास रहा है और ऐतिहासिक तौर पर दूर हो गये।

लिपुलेख पर आगे क्या हो सकता है?

नेपाल सरकार ने यह साफ़ कर दिया है कि वह कूटनीतिक माध्यमों से इस मामले को आगे बढ़ाना जारी रखेगी। लेकिन क्या इसका कोई समधाना निकल पाएगा? जवाब देना बहुत मुश्किल है। ये पूरा क्षेत्र रणनीतिक तौर पर इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत यहां अपने सैन्य और नागरिक प्रोजेक्ट्स को और आगे बढ़ाएगा। चीन की लगातार इस क्षेत्र पर नजर रहेगी लिहाजा नेपाल अगर लगातार कड़ी प्रतिक्रिया देता रहेगा तो शायद ही विवाद का कोई समधान निकल पाएगा। दोनों देशों के बीच ये मुद्दा शायद हिमालय की तरह की मुश्किल रहने वाला है।

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# International News

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