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साल्हेओना गांव के लोग सदियों से इस परंपरा का पालन कर रहे हैं। अगर देशभर में होली सोमवार को है, तो इस गांव के लोग अगले दिन यानी मंगलवार का इंतजार करेंगे। वहीं अगर बुधवार को होली पड़ती है, तो ये लोग शनिवार तक रुक जाते हैं। जब तक मंगलवार या शनिवार नहीं आता, गांव में न तो रंग उड़ता है और न ही होलिका जलाई जाती है।
ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा को तोड़ने से गांव पर बड़ी विपदा आ सकती है। बुजुर्गों के अनुसार, दशकों पहले गांव में भीषण आगजनी और बीमारियां फैली थीं, जिसके बाद पूर्वजों ने यह संकल्प लिया था कि संकटों से मुक्ति के लिए केवल हनुमान जी और शनि देव के दिनों (मंगलवार/शनिवार) को ही पर्व मनाया जाएगा।
जब पूरी दुनिया होली के जश्न में डूबी होती है, तब इस गांव में सामान्य कामकाज चलता रहता है।
गांव की बैठक में दिन तय किया जाता है और पूरा गांव एक साथ उसी दिन रंग खेलता है।
आधुनिकता के दौर में भी गांव के युवा इस सांस्कृतिक विरासत को उसी शिद्दत से निभा रहे हैं।
गांव के जानकारों का कहना है कि यह केवल अंधविश्वास नहीं बल्कि उनकी आस्था और एकता का प्रतीक है। यही वजह है कि आसपास के गांवों के लोग भी साल्हेओना की इस अनूठी होली को देखने पहुंचते हैं। गांव वालों का कहना है कि ये पुरखों का नियम है, इसे नहीं तोड़ेंगे।
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