विद्यालय में मौजूद बच्चों के भीतर छूटते जा रहे सीखने के अवसरों की समीक्षा
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )
विद्यालय में होना और सीखने में होना दो अलग अवस्थाएँ हैं।
सुबह की प्रार्थना समाप्त हो चुकी है। बच्चे कक्षाओं में पहुँच चुके हैं। शिक्षक पुस्तक खोलते हैं और पाठ शुरू होता है। कुछ बच्चे ध्यान से सुन रहे हैं, कुछ लिख रहे हैं और कुछ चुपचाप पन्ने पलट रहे हैं।
शिक्षक एक अनुच्छेद पढ़कर पूछते हैं बताओ, इसमें क्या समझ आया? कुछ हाथ उठते हैं। कई बच्चे चुप रहते हैं।
पिछली बेंच पर बैठा एक बच्चा किताब के शब्दों को देखता है, लेकिन उनका अर्थ अपने शब्दों में नहीं बता पाता। गणित की कॉपी में वह जोड़ कर लेता है, लेकिन वही संख्या जब रोजमर्रा की किसी समस्या में सामने आती है, तो वह ठिठक जाता है।
उपस्थिति रजिस्टर में वह मौजूद है। किताब उसके सामने है।शिक्षक पढ़ा रहे हैं। फिर भी सीखने में कहीं एक दूरी है।
यहीं शिक्षा का सबसे बुनियादी प्रश्न सामने आता है। क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं, या उन्हें वास्तव में सीखने में सक्षम बना रहे हैं?
1. उपस्थिति से आगे : क्या बच्चा सचमुच सीख रहा है?
विद्यालय आना शिक्षा की पहली शर्त है, अंतिम उपलब्धि नहीं। नियमित उपस्थिति जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि विद्यालय बच्चे के लिए ऐसा स्थान बने जहाँ वह समझे, पूछे, प्रयोग करे, गलती करे, फिर प्रयास करे और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े।
शिक्षा की गुणवत्ता पर चर्चा अक्सर नामांकन, उपस्थिति और परीक्षा परिणामों के आसपास सिमट जाती है। ये महत्वपूर्ण संकेतक हैं, लेकिन इनके पीछे छिपे बच्चे की वास्तविक सीखने की कहानी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
उपस्थिति रजिस्टर बताता है कि बच्चा विद्यालय पहुँचा; अधिगम बताता है कि विद्यालय बच्चे तक कितना पहुँचा।
यहीं से पढ़ाई और सीखने के बीच का फासला दिखाई देने लगता है।
2. अनुपस्थिति के पीछे छिपी कहानी :
किसी बच्चे की अनियमित उपस्थिति को देखकर उसे लापरवाह कहना आसान है। लेकिन हर अनुपस्थिति के पीछे कई परिस्थिति हो सकती है आर्थिक कठिनाई, घरेलू जिम्मेदारी, विद्यालय की दूरी, स्वास्थ्य संबंधी समस्या या परिवार की अपनी प्राथमिकताएँ।
इसलिए विद्यालय का प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए, कौन अनुपस्थित है? सवाल यह भी होना चाहिए वह क्यों अनुपस्थित है? और उसकी छूटी हुई सीखने की कड़ी कैसे जोड़ी जाए?
हर अनुपस्थित बच्चा एक संख्या नहीं, एक कहानी है।
अनुपस्थिति दर्ज करना प्रशासनिक आवश्यकता है; उसके कारण को समझना शैक्षिक जिम्मेदारी।
3. बुनियाद कमजोर हो तो बच्चा पीछे छूटता है :
यदि बच्चा सहजता से पढ़ नहीं पाता, पढ़े हुए का अर्थ नहीं समझता, अपने विचार लिख नहीं पाता या सामान्य संख्यात्मक अवधारणाओं का उपयोग नहीं कर पाता, तो समस्या केवल उसकी वर्तमान कक्षा तक सीमित नहीं रहती। वह उसकी आगे की पूरी शैक्षिक यात्रा को प्रभावित कर सकती है।
भाषा और गणित की आधारभूत दक्षताएँ किसी विषय की तैयारी भर नहीं हैं। वे सीखने की भाषा और सोचने के औजार हैं।
शब्द पढ़ लेना और उनका अर्थ समझ लेना अलग अलग बातें हैं। संख्या पहचान लेना और उसे वास्तविक जीवन में उपयोग कर पाना भी अलग अलग बात है।
यदि प्रारंभिक वर्षों में इन क्षमताओं की मजबूत नींव नहीं बनती, तो आगे की कक्षाओं में कठिनाई बढ़ती जाती है।
बुनियाद कमजोर हो तो पाठ आगे बढ़ता है, बच्चा नहीं।
4. एक कक्षा, कई अधिगम यात्राएँ :
कक्षा में बैठे बच्चे एक जैसे नहीं होते। कोई पहले से पढ़ना जानता है, किसी ने अभी अक्षरों से दोस्ती शुरू की है। कोई तुरंत उत्तर देता है, किसी को सोचने के लिए अधिक समय चाहिए। किसी को गतिविधि से समझ आता है, तो कोई बातचीत और उदाहरणों से बेहतर सीखता है।
फिर भी कई बार हम सभी बच्चों से एक ही गति, एक ही तरीके और एक ही समय में एक जैसा प्रदर्शन चाहते हैं।
यहीं स्तरानुकूल शिक्षण की जरूरत सामने आती है।
बच्चों को तेज और कमजोर के स्थायी खाँचों में बाँटना समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि शिक्षक जाने कि बच्चा अभी कहाँ है और उसे अगले पड़ाव तक पहुँचने के लिए किस तरह के अनुभव और सहयोग की जरूरत है।
एक ही कक्षा में समान अवसर का अर्थ एक जैसा शिक्षण नहीं है।
5. शिक्षक भी व्यवस्था का हिस्सा है :
कक्षा की चुनौतियों पर बात करते समय शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना सबसे आसान रास्ता है। लेकिन शिक्षक भी उसी व्यवस्था के भीतर काम करता है।
एक ही कक्षा में अलग अलग स्तर के बच्चे, सीमित समय, पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ, संसाधनों की कमी और कभी बड़ी विद्यार्थी संख्या l इन सबके बीच व्यक्तिगत और स्तरानुकूल शिक्षण आसान नहीं है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि शिक्षक क्यों नहीं कर रहा? सवाल होना चाहिए कि हम शिक्षक को बेहतर करने के लिए क्या दे रहे हैं?
प्रशिक्षण, शैक्षणिक सहयोग, पर्याप्त समय, उपयोगी शिक्षण सामग्री और विद्यालय स्तरीय अकादमिक नेतृत्व गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की आधारभूमि हैं।
6. जब कक्षा किताब से बाहर निकलती है :
शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM) का मूल्य उसकी कीमत या सजावट में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह बच्चे को देखने से समझने और समझने से करने तक कितना ले जाती है।
एक रंगीन चार्ट, कुछ कंकड़, स्थानीय बाजार की कीमतें, पानी से भरा गिलास, कहानी की पुस्तक या बच्चों द्वारा बनाई गई कोई वस्तु सही उद्देश्य से उपयोग होने पर ये सभी सीखने के प्रभावी साधन बन सकते हैं।
सबसे अच्छा TLM वह नहीं जो कक्षा को सुंदर बनाए; वह है जो बच्चे के मन में क्यों? और कैसे? का सवाल पैदा कर दे।
इसी तरह गतिविधि आधारित शिक्षण का अर्थ केवल बड़े प्रयोग या विशेष आयोजन नहीं है। कहानी, खेल, समूह चर्चा, भूमिका अभिनय, स्थानीय वस्तु, सहपाठी अधिगम और छोटी समस्या भी बच्चे को सक्रिय सीखने की ओर ले जा सकती है।
बच्चा केवल सुनकर नहीं सीखता। वह करके, पूछकर, देखकर, चर्चा करके और अपनी गलती से भी सीखता है।
7. जब गणित जीवन से जुड़ता है :
गणित की कक्षा में बच्चा केवल सवाल हल करे तो वह प्रक्रिया याद कर सकता है। लेकिन जब वही बच्चा बाजार में कीमतों की तुलना करता है, पानी की मात्रा मापता है, यात्रा की दूरी का अनुमान लगाता है या खेल में स्कोर का हिसाब करता है, तब गणित उसके अनुभव का हिस्सा बन जाता है।
गिनना, वर्गीकरण करना, पैटर्न पहचानना, अनुमान लगाना, मापना, तुलना करना और समस्या का समाधान करना; ये सभी गणितीय सोच के जीवंत अवसर हैं।
जब गणित जीवन से जुड़ता है, तब संख्या डराती नहीं; वह दुनिया को समझने का एक तरीका बन जाती है।
8. अंक से आगे : सीखने की पहचान
परीक्षा के बाद अंक मिलते हैं। लेकिन अंक हमेशा यह नहीं बताते कि बच्चा कहाँ अटका है।
यदि बच्चा बार बार एक ही तरह की गलती करता है, तो केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि उसने कितने अंक खोए। हमें समझना होगा कि वह गलती क्यों कर रहा है।
क्या अवधारणा स्पष्ट नहीं है?
क्या भाषा समझ में नहीं आई?
क्या प्रश्न समझने में कठिनाई है?
क्या पर्याप्त अभ्यास नहीं हुआ?
क्या बच्चे को अलग प्रकार के सहयोग की जरूरत है?
यहीं मूल्यांकन की वास्तविक भूमिका शुरू होती है। अंक परिणाम बताते हैं; आकलन रास्ता बताता है।
मूल्यांकन का उद्देश्य बच्चे पर फैसला सुनाना नहीं, बल्कि अगले शिक्षण कदम को स्पष्ट करना है। जब आकलन शिक्षण को बदलने लगे, तभी वह सार्थक है।
9. जब किताब बच्चे के हाथ तक पहुँचती है :
पुस्तकालय या रीडिंग कॉर्नर होना अच्छी शुरुआत है। लेकिन उसकी सफलता किताबों की संख्या से नहीं, बच्चों के हाथों में खुली किताबों से दिखाई देती है।
यदि पुस्तकें बच्चों की आयु, भाषा और रुचि से जुड़ी हों, नियमित पठन का समय मिले और पढ़ने के बाद बातचीत व अभिव्यक्ति का अवसर हो, तो पुस्तकालय धीरे धीरे कक्षा की संस्कृति बदल सकता है।
एक बच्चा कहानी पढ़ेगा। दूसरा चित्र देखकर अपनी कहानी बनाएगा। तीसरा पढ़ी हुई बात मित्र को सुनाएगा।
यहीं पठन अभ्यास से आगे बढ़कर आनंद, कल्पना और आत्म अभिव्यक्ति बनता है।
पुस्तकालय की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी भरी हुई अलमारी नहीं, बच्चों के भीतर जागी हुई पढ़ने की इच्छा है।
10. घर में भी जारी रहे सीखना :
बच्चा विद्यालय से घर लौटता है। अक्सर पहला सवाल होता है कि आज कितने नंबर आए? शायद इससे अधिक महत्वपूर्ण सवाल हो कि आज तुमने क्या नया सीखा?
हर अभिभावक के पास समान समय, संसाधन या शैक्षिक पृष्ठभूमि नहीं होती। इसलिए अभिभावक सहभागिता को केवल बैठकों में उपस्थिति से मापना उचित नहीं।
बच्चे के साथ कुछ मिनट बातचीत करना, उसकी किताब देखना, उसकी कहानी सुनना और उसके प्रश्न को गंभीरता से लेना। ये छोटे काम सीखने के लिए बड़ा भावनात्मक आधार बन सकते हैं।
बच्चे की सीख में सबसे बड़ी भूमिका कभी कभी एक सवाल की होती है कि आज तुमने क्या सीखा?
11. एक शिक्षक, कई स्तर : चुनौती या संभावना?
एक ही शिक्षक के सामने अलग अलग स्तर के बच्चे हों तो कक्षा प्रबंधन कठिन हो सकता है। लेकिन विविधता को केवल समस्या मानना भी अधूरा दृष्टिकोण है।
छोटे समूह, स्तरानुसार कार्य, सहपाठी अधिगम, स्व अधिगम सामग्री और स्पष्ट समय नियोजन के माध्यम से बच्चे एक दूसरे के सीखने में सहयोग कर सकते हैं।
कभी बड़ा बच्चा छोटे को पढ़ाता है और पढ़ाते हुए स्वयं अधिक गहराई से सीखता है।
बहुस्तरीय कक्षा की चुनौती बच्चों की विविधता नहीं; चुनौती यह है कि हम उस विविधता को सीखने की शक्ति में कितना बदल पाते हैं।
12. कमजोर बच्चा या हमारी अधूरी समझ? :
किसी बच्चे का परिणाम अपेक्षित न आए तो सबसे आसान निष्कर्ष होता है कि यह बच्चा कमजोर है। लेकिन क्या हमने पूछा,
क्या वह नियमित विद्यालय आ पाया?
क्या उसकी पिछली कक्षा की बुनियादी समझ मजबूत थी?
क्या उसे अपनी गति से सीखने का अवसर मिला?
क्या उसके स्तर की सही पहचान हुई?
क्या घर और विद्यालय के बीच संवाद रहा?
क्या उसे गलती सुधारने का अवसर मिला?
बच्चे को कमजोर कह देना समस्या का नामकरण है; उसकी कठिनाई का कारण खोज लेना शिक्षा का काम है।
किसी बच्चे को कमजोर कहना सबसे आसान निष्कर्ष है; उसे समझना सबसे कठिन और सबसे जरूरी काम।
13. आँकड़ों के पीछे कौन है? :
नामांकन बढ़ सकता है। उपस्थिति सुधर सकती है। परीक्षा परिणाम बेहतर हो सकते हैं। लेकिन इन सबके पीछे एक प्रश्न लगातार जीवित रहना चाहिए
क्या बच्चा वास्तव में सीख रहा है?
क्या वह पढ़ सकता है?
क्या वह समझ सकता है?
क्या वह अपने विचार व्यक्त कर सकता है?
क्या वह तर्क कर सकता है?
क्या वह समस्या का समाधान खोज सकता है?
क्या वह सीखी हुई बात को नई परिस्थिति में इस्तेमाल कर सकता है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर कमजोर हैं, तो केवल आँकड़ों का बेहतर होना पर्याप्त नहीं।
शिक्षा के आँकड़े व्यवस्था की तस्वीर दिखाते हैं; बच्चे का व्यवहार उस तस्वीर की सच्चाई बताता है।
शिक्षा को केवल परिणामों की भाषा से निकालकर अधिगम की भाषा में देखने की जरूरत यहीं से शुरू होती है।
14. कक्षा का केंद्र : शिक्षक या बच्चा?
शिक्षण का केंद्र एक बुनियादी बदलाव चाहता है।
हमें शिक्षक ने क्या पढ़ाया? से आगे बढ़कर बच्चे ने क्या सीखा? पूछना होगा।
हमें कितने पाठ पूरे हुए? से आगे बढ़कर कितनी समझ विकसित हुई? देखना होगा।
हमें कितने अंक आए? से आगे बढ़कर बच्चा क्या कर सकता है? पूछना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण हमें कौन कमजोर है? से आगे बढ़कर पूछना होगा कि किसे किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता है?
इसके लिए विद्यालयी व्यवस्था को लगातार कुछ बुनियादी बातों पर काम करना होगा
बच्चे के वास्तविक अधिगम स्तर की पहचान
आधारभूत भाषा एवं गणितीय दक्षताओं को प्राथमिकता
स्तरानुकूल और बाल केंद्रित शिक्षण
स्थानीय एवं सहज शिक्षण सामग्री का सार्थक उपयोग
गतिविधि और अनुभव आधारित शिक्षण
आकलन के आधार पर शिक्षण में सुधार
जीवंत पुस्तकालय एवं पठन संस्कृति
अभिभावकों की अर्थपूर्ण सहभागिता
बहुस्तरीय कक्षाओं के लिए प्रभावी रणनीतियाँ
प्रत्येक बच्चे की सीखने की प्रगति पर निरंतर ध्यान
यह बदलाव किसी एक योजना, एक प्रशिक्षण या एक परीक्षा से नहीं आएगा। यह उस रोजमर्रा की शैक्षिक संस्कृति से आएगा, जिसमें शिक्षक स्वयं से पूछे कि
आज मेरी कक्षा में किस बच्चे ने कुछ नया समझा, और किस बच्चे तक मैं अभी नहीं पहुँच पाया?
15 अंततः सवाल बच्चे का है :
शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यह नहीं कि बच्चे ने कितने पन्ने पढ़े, कितने प्रश्न हल किए या कितने अंक प्राप्त किए। सवाल यह है कि विद्यालय ने उसके भीतर क्या जगाया।
क्या उसकी जिज्ञासा बढ़ी?
क्या उसमें प्रश्न पूछने का साहस आया?
क्या उसकी भाषा समृद्ध हुई?
क्या उसकी गणितीय सोच विकसित हुई?
क्या वह अपनी गलती से सीखना जानता है?
क्या वह किसी समस्या के सामने ठहरकर सोच सकता है?
क्या उसे अपने सीखने पर विश्वास है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तो पढ़ाई ने सीखने का रूप लिया है। और यदि नहीं, तो शायद हमें बच्चे से पहले अपनी कक्षा को देखने की जरूरत है।
पढ़ाई का अंत पाठ पूरा होने पर नहीं, समझ पैदा होने पर होता है। यही शिक्षा की असली कसौटी है।
विद्यालय की सफलता केवल इस बात में नहीं कि वहाँ कितने बच्चे पढ़ते हैं; बल्कि इस बात में है कि वहाँ से निकलने वाला हर बच्चा कितना समझता है, कितना सोचता है और कितना सीखते रहने के लिए तैयार है।
शायद शिक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा परीक्षा कक्ष में नहीं होती। वह उस क्षण होती है जब बच्चा कक्षा से बाहर निकलकर किसी नई परिस्थिति के सामने ठहरे और कह सके कि
मैं इसे समझने की कोशिश कर सकता हूँ। वहीं पढ़ाई से आगे बढ़कर सीखना शुरू होता है।
16. संदर्भ :
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020l शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा : बुनियादी अवस्था, 2020। नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा : विद्यालयी शिक्षा, 2023। नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद।
निपुण भारत : बुनियादी साक्षरता एवं संख्याज्ञान के लिए राष्ट्रीय मिशन। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
परख : राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट, 2024। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन, असर केंद्र, नई दिल्ली ।
वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट, 2024/25 : शिक्षा में नेतृत्व अधिगम के लिए नेतृत्व। पेरिस: यूनेस्को।