✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )
यह लेख आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में परिणाम-केन्द्रितता, बाजारवाद और औपचारिक मूल्यांकन-प्रणाली के बढ़ते प्रभाव के कारण शिक्षा की मूल आत्मा - अधिगम, विवेक और मानवीयता - के क्रमिक क्षरण का विश्लेषण करता है। यह प्रतिपादित करता है कि शिक्षा, जो मूलतः मानव-निर्माण की प्रक्रिया थी, आज क्रमशः मानव-संसाधन उत्पादन एवं सांख्यिकीय उपलब्धियों की व्यवस्था में परिवर्तित हो गई है। इस परिवर्तन ने न केवल अधिगम-गुणवत्ता को प्रभावित किया है, बल्कि शिक्षक, शिक्षार्थी और समाज - तीनों के नैतिक एवं बौद्धिक संतुलन को भी चुनौती दी है।
1. प्रस्तावना :
किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी शिक्षा-व्यवस्था में प्रतिबिंबित होती है। शिक्षा केवल ज्ञानार्जन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विवेक, संवेदना, नैतिकता और उत्तरदायित्व के निर्माण का माध्यम है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में इसे आत्मोन्नति एवं लोकमंगल का साधन माना गया है।
“शिक्षा का अधिकार अधिनियम” (2009) इसी दृष्टि से एक ऐतिहासिक पहल थी, जिसका उद्देश्य प्रत्येक बालक को निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना था। किंतु वर्तमान समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या शिक्षा-व्यवस्था वास्तविक अधिगम में रूपांतरित हो पाई है या केवल औपचारिक परिणामों और सांख्यिकीय उपलब्धियों तक सीमित रह गई है।
यह लेख यह तर्क प्रस्तुत करता है कि आधुनिक शिक्षा-तंत्र परिणाम-केन्द्रितता, बाजारवाद और तकनीकी-उपभोग संस्कृति के प्रभाव में अपनी अधिगम-आधारित आत्मा को क्रमशः खो रहा है।
2. शिक्षा का उद्देश्य और समकालीन विचलन :
शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल परीक्षा-उत्तीर्णता नहीं, बल्कि चिंतनशीलता, तार्किकता, सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों का विकास है। यह व्यक्ति को केवल जीविकोपार्जन योग्य नहीं बनाती, बल्कि उसे एक उत्तरदायी नागरिक के रूप में रूपांतरित करती है।
किन्तु वर्तमान व्यवस्था में शिक्षा का केंद्र ज्ञान से हटकर अंक, प्रतिशत और रैंक-आधारित प्रदर्शन की ओर स्थानांतरित हो गया है। परिणामस्वरूप अधिगम का स्थान मापन-आधारित उपलब्धि ने ले लिया है।
नेल्सन मंडेला के अनुसार - “शिक्षा वह सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिससे विश्व को बदला जा सकता है।”
किन्तु जब शिक्षा केवल आंकड़ों और परिणामों तक सीमित हो जाती है, तब उसका दार्शनिक और मानवीय उद्देश्य कमजोर पड़ने लगता है।
3. अधिगम और परिणाम का संरचनात्मक अंतर्विरोध :
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों (असर, नैस, एनसीईआरटी रिपोर्ट) के अनुसार बड़ी संख्या में विद्यार्थी कक्षा-स्तरीय मूलभूत दक्षताओं - पठन, गणना और बोध - में अपेक्षित स्तर प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।
यह स्थिति केवल अधिगम-घाटे को नहीं, बल्कि मूल्यांकन-प्रणाली की संरचनात्मक सीमाओं को भी उजागर करती है।
यूनेस्को (वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट, 2022) के अनुसार - “अधिगम-परिणाम सदैव शिक्षा के वर्षों को प्रतिबिंबित नहीं करते।”
अल्बर्ट आइंस्टीन के शब्दों में - “शिक्षा तथ्यों का अधिगम नहीं, बल्कि चिंतन-शक्ति का प्रशिक्षण है।”
इस प्रकार, यदि शिक्षा केवल प्रमाणपत्र-उत्पादन प्रणाली बन जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से विचलित हो जाती है।
4. शिक्षक की स्थिति और प्रणालीगत दबाव :
वर्तमान शिक्षा-तंत्र में शिक्षक एक गहरे संस्थागत द्वंद्व से गुजर रहा है। एक ओर उससे गुणवत्तापूर्ण अधिगम की अपेक्षा है, दूसरी ओर शत-प्रतिशत परिणामों का प्रशासनिक दबाव।
गैर-शैक्षणिक कार्यभार, संसाधनों की कमी और प्रदर्शन-केन्द्रित मूल्यांकन ने शिक्षण को यांत्रिक बना दिया है। इसका परिणाम कक्षा-परिसर में भय, औपचारिकता और दबाव के रूप में दिखाई देता है।
जॉन ड्यूई के अनुसार - “शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं, बल्कि स्वयं जीवन है।” जब शिक्षा केवल परिणाम-उत्पादन बन जाती है, तब उसका अनुभवात्मक स्वरूप क्षीण हो जाता है।
5. डिजिटल युग और अधिगम का विखंडन :
डिजिटल युग ने ज्ञान की उपलब्धता को अत्यधिक विस्तृत किया है, किंतु इसके साथ अधिगम की गहराई प्रभावित हुई है। सूचना की अति-उपलब्धता ने ज्ञान और समझ के बीच अंतर को बढ़ा दिया है।
ध्यान-क्षरण, त्वरित उपभोग संस्कृति और सतही अधिगम की प्रवृत्तियाँ शिक्षार्थियों की संज्ञानात्मक संरचना को प्रभावित कर रही हैं। तकनीक, यदि केवल सूचना-उपभोग का माध्यम बन जाए, तो वह अधिगम को गहराई के स्थान पर सतहीपन की ओर ले जाती है।
6. शिक्षा का वस्तुकरण और बाजारवाद :
आज शिक्षा धीरे-धीरे मानव-निर्माण से मानव-संसाधन निर्माण की ओर बढ़ रही है। कोचिंग उद्योग, प्रतिस्पर्धात्मक रैंकिंग और निजीकरण ने शिक्षा को एक बाजार-आधारित वस्तु में परिवर्तित कर दिया है।
यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य “समझ” से अधिक “उपलब्धि” बनता जा रहा है।
इस प्रक्रिया में शिक्षा की मानवीय और नैतिक आत्मा क्रमशः क्षीण होती जाती है।
7. नैतिक संकट और मूल्य-क्षरण :
जहाँ सफलता का मापदंड सत्यनिष्ठा के स्थान पर केवल परिणाम बन जाए, वहाँ शिक्षा-व्यवस्था गहरे नैतिक संकट में प्रवेश कर जाती है।
मिशेल फूको के अनुसार - “ज्ञान केवल जानने के लिए नहीं, बल्कि शक्ति का माध्यम भी बन सकता है।”
अतः जब ज्ञान केवल प्रतिस्पर्धा और नियंत्रण का साधन बन जाता है, तब उसका नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।
8. सुधार की दिशा: साझा उत्तरदायित्व
शिक्षा-सुधार किसी एक पक्ष का कार्य नहीं, बल्कि राज्य, नीति-निर्माता, शिक्षक, अभिभावक और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
मूल्यांकन प्रणाली को बहुआयामी, पारदर्शी और अधिगम-केन्द्रित बनाना आवश्यक है। साथ ही शिक्षक को पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन और संस्थागत सम्मान प्रदान किया जाना चाहिए।
नेल्सन मंडेला के अनुसार - “असंभव केवल तब तक लगता है, जब तक वह किया नहीं जाता।”
9. उपसंहार :
शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा जब शिक्षा केवल औपचारिक उत्तीर्णता का माध्यम न रहकर वास्तविक ज्ञान, विवेक और नैतिक चेतना का आधार बने।
आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि शिक्षा की आत्मा के पुनर्स्थापन की है। जब शिक्षा भय और दबाव से मुक्त होकर सृजनात्मक, अनुभवात्मक और मूल्य-आधारित दिशा में अग्रसर होगी, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगी।
अंततः किसी राष्ट्र की शिक्षा-व्यवस्था उसकी अंकतालिकाओं से नहीं, बल्कि उसकी चिंतनशीलता, नैतिक संवेदनशीलता और मानवीय चेतना से पहचानी जाती है।
10. संदर्भ सूची :
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