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शिक्षा : क्या हम बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं या केवल उनके रिज़ल्ट? :

Abhyuday Bharat News / Mon, Jun 1, 2026 / Post views : 305

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अंकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में शिक्षा का सबसे बड़ा प्रश्न

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

( शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ )

रात के ग्यारह बजे हैं। एक बच्चा अब भी कोचिंग के नोट्स दोहरा रहा है, जबकि उसकी उम्र अभी सपने देखने की है।

टेबल पर खुली किताबें हैं, स्क्रीन पर ऑनलाइन टेस्ट का विश्लेषण है और कमरे के बाहर भविष्य को लेकर बेचैन उम्मीदें। उसकी आँखों में नींद कम, प्रदर्शन का दबाव अधिक है।

शायद 21वीं सदी का बच्चा इतिहास की सबसे अधिक “मूल्यांकित” पीढ़ी है। उसकी बुद्धि को अंकों में, उसकी क्षमता को रैंक में और उसके भविष्य को प्रतिशत तथा प्रदर्शन की भाषा में मापा जा रहा है।

विद्यालयों से लेकर कोचिंग संस्थानों तक, अभिभावकों की अपेक्षाओं से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्मों तक—हर जगह एक अदृश्य दौड़ जारी है। बच्चे सीख कम रहे हैं और स्वयं को साबित अधिक कर रहे हैं।

“आज बच्चों पर सबसे बड़ा दबाव पढ़ाई का नहीं, साबित करने का है।”

यही हमारे समय का सबसे बड़ा शैक्षिक विरोधाभास है—हम शिक्षा का विस्तार तो कर रहे हैं, लेकिन बचपन का विस्तार नहीं।

आज शिक्षा का सबसे बड़ा संकट संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उद्देश्य का भ्रम है। हम यह तय ही नहीं कर पा रहे कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य क्या है—प्रतियोगी विजेता तैयार करना, आर्थिक व्यवस्था के लिए मानव संसाधन बनाना, या संवेदनशील, स्वतंत्र और विवेकशील मनुष्य गढ़ना?

भारतीय ज्ञान-परंपरा में “विद्या” का अर्थ केवल सूचना प्राप्त करना नहीं था; वह मनुष्य के भीतर विवेक, संतुलन और आत्मबोध जगाने की प्रक्रिया मानी जाती थी।

जिद्दू कृष्णमूर्ति ने कहा था— “शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका कमाना नहीं, बल्कि जीवन को समझना है।”

यहीं से यह असहज लेकिन आवश्यक प्रश्न जन्म लेता है— क्या हम बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं, या केवल उनके रिज़ल्ट?

1. रिज़ल्ट की दौड़ में सिकुड़ता बचपन :

आज का बच्चा बचपन से अधिक “प्रदर्शन” जी रहा है। उसकी दिनचर्या में खेल कम और मूल्यांकन अधिक है। स्कूल, ट्यूशन, टेस्ट-सीरीज़ और निरंतर तुलना ने बचपन की सहजता को धीरे-धीरे तनाव में बदल दिया है।

अब शिक्षा “ज्ञान की यात्रा” नहीं, बल्कि “प्रदर्शन प्रबंधन” बनती जा रही है।

“हर समय मूल्यांकित होता बच्चा धीरे-धीरे स्वयं को ‘मनुष्य’ नहीं, ‘प्रदर्शन’ समझने लगता है।”

एक समय था जब बच्चे पूछते थे—“यह क्यों होता है?”

अब वे पूछते हैं—“यह परीक्षा में आएगा क्या?”

यहीं शिक्षा का सबसे सूक्ष्म संकट दिखाई देता है—जिज्ञासा धीरे-धीरे उपयोगिता में बदल रही है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था— “उच्चतम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि जीवन के साथ सामंजस्य स्थापित करना सिखाती है।”

2. क्या अंक ही बुद्धिमत्ता का अंतिम प्रमाण हैं? :

हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी यह मानकर चलती है कि हर बच्चे की प्रतिभा एक जैसी होती है और उसे एक ही पैमाने से मापा जा सकता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और मानवीय है।

एक बच्चा गणित में औसत हो सकता है, लेकिन कल्पनाशक्ति में अद्भुत। कोई विज्ञान में कमजोर दिख सकता है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं को गहराई से समझ सकता है। किसी में नेतृत्व क्षमता हो सकती है, किसी में कला की विलक्षण प्रतिभा।

“हर प्रतिभा रिपोर्ट कार्ड में दिखाई नहीं देती।”

अल्बर्ट आइंस्टीन का प्रसिद्ध कथन आज भी शिक्षा पर सबसे गहरी टिप्पणी माना जाता है— “यदि आप किसी मछली का मूल्यांकन पेड़ पर चढ़ने की उसकी क्षमता से करेंगे, तो वह पूरी जिंदगी स्वयं को मूर्ख समझेगी।”

लेकिन हमारी व्यवस्था अब भी “एकरूप सफलता” का मॉडल थोपती है। परिणामस्वरूप लाखों बच्चे स्वयं को कमतर मानने लगते हैं, केवल इसलिए क्योंकि वे निर्धारित साँचे में फिट नहीं बैठते।

3. टॉपर बनते बच्चे, थकते मन :

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में किशोरों में मानसिक तनाव और अवसाद तेजी से बढ़ रहा है। शिक्षा का बढ़ता दबाव भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।

“हम बच्चों को सफल होने की तकनीक सिखा रहे हैं, लेकिन संतुलित रहने की कला नहीं।”

विडम्बना यह है कि हम बच्चों को करियर के लिए तैयार कर रहे हैं, लेकिन जीवन के लिए नहीं।

उन्हें समीकरण हल करना सिखाया जा रहा है, लेकिन भावनाएँ संभालना नहीं। उन्हें प्रतिस्पर्धा सिखाई जा रही है, लेकिन संबंध बनाना नहीं। उन्हें सफलता का अर्थ बताया जा रहा है, लेकिन असफलता का सामना करना नहीं।

स्वामी विवेकानंद का यह विचार आज पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है— “हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।”

यदि कोई बच्चा उच्च अंक लाकर भी भीतर से भयग्रस्त, असुरक्षित और मानसिक रूप से थका हुआ है, तो हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर पुनर्विचार करना होगा।

4. जब मशीनें उत्तर देने लगें, तब शिक्षा क्या सिखाए? :

जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही सेकंड में उत्तर दे सकती है, तब शिक्षा का उद्देश्य केवल “उत्तर याद करवाना” नहीं रह सकता।

भविष्य में मशीनें सूचना, गणना और विश्लेषण मनुष्यों से बेहतर कर सकती हैं। लेकिन करुणा, नैतिक विवेक, रचनात्मकता और मानवीय संवेदनाएँ अब भी मनुष्य की सबसे बड़ी शक्तियाँ रहेंगी।

“जिस युग में मशीनें उत्तर दे रही हैं, उस युग में शिक्षा को प्रश्न पैदा करने होंगे।”

इतिहासकार और चिंतक यूवल नोआ हरारी लिखते हैं— “21वीं सदी में सबसे महत्वपूर्ण कौशल होगा—परिवर्तन के साथ स्वयं को लगातार पुनर्निर्मित करने की क्षमता।”

इसलिए भविष्य की शिक्षा “रटने” से अधिक “सोचने” पर आधारित होगी। बच्चों को तथ्यों का भंडार नहीं, बल्कि चिंतनशील मनुष्य बनाना होगा l

5. जब शिक्षा बाज़ार बनी और बच्चा उत्पाद :

आज शिक्षा केवल सामाजिक संस्था नहीं रही; वह एक विशाल उद्योग भी बन चुकी है। कोचिंग संस्कृति, रैंकिंग मॉडल और “सफलता” की आक्रामक मार्केटिंग ने बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से “उत्पाद” में बदलना शुरू कर दिया है।

“जब शिक्षा सेवा से अधिक उद्योग बनती है, तब बच्चा धीरे-धीरे व्यक्ति से ‘प्रोडक्ट’ में बदलने लगता है।”

विद्यालयों का मूल्यांकन अब अक्सर इस आधार पर होने लगा है कि कितने विद्यार्थियों ने उच्च अंक प्राप्त किए, न कि इस आधार पर कि कितने बच्चे जिज्ञासु, संवेदनशील और मानसिक रूप से स्वस्थ बने।

“सच्ची शिक्षा वही है जो शरीर, मन और आत्मा का संतुलित विकास करे।”

6. स्क्रीन, सिलेबस और सिमटता जीवन :

आज अधिकांश बच्चे प्रकृति, समुदाय और वास्तविक जीवन-अनुभवों से दूर होते जा रहे हैं। उनका संसार स्क्रीन, परीक्षा और कृत्रिम उपलब्धियों तक सीमित होता जा रहा है।

वे पेड़ पहचानने से अधिक ऐप पहचानते हैं।

वे पड़ोसियों से कम और एल्गोरिद्म से अधिक संवाद करते हैं।

“बच्चे अब प्रकृति से कम और नोटिफिकेशन से अधिक घिरे हुए हैं।”

धीरे-धीरे बच्चों का अनुभव-संसार वास्तविक जीवन से अधिक डिजिटल प्रतिक्रिया पर आधारित होता जा रहा है।

यदि शिक्षा बच्चे को समाज, प्रकृति और मानवीय वास्तविकताओं से नहीं जोड़ती, तो वह अधूरी शिक्षा है।

7. नई शिक्षा नीति और पुरानी मानसिकता का संघर्ष :

भारत आज एक जटिल संक्रमणकाल से गुजर रहा है। एक ओर नई शिक्षा नीति समग्र और बहुविषयी शिक्षा की बात करती है; दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ अब भी बोर्ड प्रतिशत और प्रतियोगी परीक्षाओं से संचालित है।

शिक्षक सिलेबस के दबाव में हैं।

अभिभावक भविष्य की असुरक्षा से चिंतित हैं।

और बच्चे अपेक्षाओं के भार के नीचे धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक पहचान खो रहे हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है— क्या हम बच्चों को उनकी विशिष्टता के अनुसार विकसित कर रहे हैं, या केवल व्यवस्था के साँचे में ढाल रहे हैं?

8. भविष्य अंक नहीं, व्यक्तित्व गढ़ता है :

भविष्य केवल अंकों से निर्मित नहीं होता। वास्तविक भविष्य उन गुणों से बनता है जिन्हें किसी रिपोर्ट कार्ड में पूरी तरह मापा नहीं जा सकता—

- जिज्ञासा

- सहानुभूति

- आलोचनात्मक चिंतन

- नैतिक विवेक

- सृजनात्मकता

- मानसिक दृढ़ता

- संवाद क्षमता

- असफलता से पुनः उठने की क्षमता

“भविष्य केवल बुद्धिमान लोगों से नहीं, संवेदनशील मनुष्यों से सुरक्षित होता है।”

यही वे गुण हैं जो किसी समाज को केवल विकसित नहीं, बल्कि सभ्य बनाते हैं।

क्योंकि हर बच्चा केवल एक करियर नहीं, एक संभावित सभ्यता भी होता है।

9. यह केवल शिक्षा नहीं, सभ्यता का प्रश्न है :

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी इमारतों, तकनीकों या अर्थव्यवस्था से पहले उसकी शिक्षा में लिखा जाता है।

यदि हमारी शिक्षा बच्चों को भय, तुलना और कृत्रिम सफलता की संस्कृति में ढालती रही, तो हम कुशल मशीनें तो बना लेंगे, लेकिन संवेदनशील मनुष्य खो देंगे।

जॉन डेवी ने कहा था— “यदि हम आज के बच्चों को कल की तरह पढ़ाएँगे, तो हम उनका भविष्य छीन लेंगे।”

शायद हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान खोते जा रहे हैं।

समय आ गया है कि हम शिक्षा से यह कठिन प्रश्न पुनः पूछें— क्या हमारा उद्देश्य केवल परिणाम उत्पन्न करना है, या भविष्य गढ़ना?

“सभ्यताएँ अंकों से नहीं, मनुष्यों से बनती हैं।”

क्योंकि रिज़ल्ट कुछ वर्षों तक याद रहते हैं, लेकिन एक शिक्षित मनुष्य पूरी सभ्यता की दिशा बदल सकता है।

और शायद अब समय आ गया है कि हम बच्चों से उनका बचपन वापस माँगना बंद करें।

10. संदर्भ सूची :

कृष्णमूर्ति, जिद्दू। शिक्षा और जीवन का महत्व। नई दिल्ली: राजपाल एंड संस, विभिन्न संस्करण।

ठाकुर, रवीन्द्रनाथ। शिक्षा पर विचार। कोलकाता: विश्वभारती प्रकाशन, विभिन्न संस्करण।

विवेकानंद, स्वामी। शिक्षा, चरित्र और युवा। कोलकाता: अद्वैत आश्रम, विभिन्न संस्करण।

डेवी, जॉन। डेमोक्रेसी एंड एजुकेशन (लोकतंत्र और शिक्षा)। न्यूयॉर्क: द मैकमिलन कंपनी, 1916।

हरारी, यूवल नोआ। 21 लेसन्स फॉर द 21st सेंचुरी (21वीं सदी के लिए 21 सबक)। लंदन: जोनाथन केप, 2018।

आइंस्टीन, अल्बर्ट। आइडियाज़ एंड ओपिनियन्स (विचार और मत)। न्यूयॉर्क: क्राउन पब्लिशर्स, 1954।

फ्रेरे, पाउलो। पेडागॉजी ऑफ द ओप्रेस्ड (शोषितों की शिक्षा-पद्धति)। न्यूयॉर्क: कंटिन्यूअम पब्लिशिंग कंपनी, 1970।

गार्डनर, हॉवर्ड। फ्रेम्स ऑफ माइंड: द थ्योरी ऑफ मल्टीपल इंटेलिजेंस (बहु-बुद्धिमत्ता का सिद्धांत)। न्यूयॉर्क: बेसिक बुक्स, 1983।

इलिच, इवान। डी-स्कूलिंग सोसाइटी (विद्यालय-मुक्त समाज)। न्यूयॉर्क: हार्पर एंड रो, 1971।

नॉडिंग्स, नेल। द चैलेंज टू केयर इन स्कूल्स: एन अल्टरनेटिव अप्रोच टू एजुकेशन (विद्यालयों में संवेदनात्मक शिक्षा की चुनौती)। न्यूयॉर्क: टीचर्स कॉलेज प्रेस, 1992।

यूनेस्को । रीइमैजिनिंग आवर फ्यूचर्स टुगेदर: ए न्यू सोशल कॉन्ट्रैक्ट फॉर एजुकेशन (शिक्षा के लिए नया सामाजिक अनुबंध)। पेरिस: यूनेस्को पब्लिशिंग, 2021।

ओईसीडी। द फ्यूचर ऑफ एजुकेशन एंड स्किल्स 2030 (शिक्षा और कौशल का भविष्य 2030)। पेरिस: ओईसीडी पब्लिशिंग, विभिन्न संस्करण।

विश्व स्वास्थ्य संगठन। किशोर मानसिक स्वास्थ्य एवं शैक्षिक तनाव संबंधी वैश्विक रिपोर्ट्स। जेनेवा: WHO Publications, विभिन्न वर्ष।

भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020। नई दिल्ली: भारत सरकार प्रकाशन विभाग, 2020।

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