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अवसर बनाम व्यवस्था : विषय चयन की अधूरी आज़ादी

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शिक्षा : अवसर बनाम व्यवस्था : विषय चयन की अधूरी आज़ादी

Abhyuday Bharat News / Wed, Jul 1, 2026 / Post views : 28

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क्या भारत का विद्यार्थी वास्तव में अपने भविष्य का चुनाव स्वयं कर पा रहा है?

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़

शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ

1. जब सपनों से पहले व्यवस्था तय करने लगे भविष्य :

भारत में हर वर्ष लाखों विद्यार्थी अपने सपनों और आकांक्षाओं के साथ विद्यालयों की दहलीज़ पर प्रवेश करते हैं। कोई इंजीनियर बनना चाहता है, कोई वैज्ञानिक, कोई वित्त विशेषज्ञ बनना चाहता है, तो कोई व्यवसाय और उद्यमिता की दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करना चाहता है। स्वाभाविक रूप से प्रत्येक विद्यार्थी यह अपेक्षा करता है कि शिक्षा व्यवस्था उसे उसकी रुचि, क्षमता और भविष्य की दिशा के अनुरूप विषय चुनने का अवसर प्रदान करेगी।

किन्तु भारतीय विद्यालयी व्यवस्था की एक कठोर वास्तविकता यह है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी यह स्वयं तय नहीं कर पाते कि उन्हें क्या पढ़ना है। अनेक परिस्थितियों में यह निर्णय उनकी रुचि नहीं, बल्कि विद्यालय की संरचनात्मक सीमाएँ, सीमित संसाधन और संस्थागत व्यवस्थाएँ तय करती हैं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था - शिक्षा वह है जो मनुष्य में निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करे।

लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था ही विकल्पों को सीमित कर दे, तब व्यक्ति की संभावनाएँ भी सीमित होने लगती हैं।

जब व्यवस्था सपनों से बड़ी हो जाए, तब प्रतिभा जन्म लेने से पहले ही सीमित हो जाती है।

2. नीतियाँ विकल्प देती हैं, लेकिन व्यवस्था सीमाएँ खड़ी कर देती है :

भारत की नई शिक्षा नीति ने शिक्षा को अधिक लचीला, बहुविषयक और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने की स्पष्ट दिशा दी है। नीति का मूल दर्शन यही है कि प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चयन की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

लेकिन जमीनी यथार्थ अक्सर इस आदर्श के बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है।

देश के हजारों विद्यालयों में उच्च माध्यमिक स्तर पर विज्ञान, गणित, वाणिज्य, कला अथवा अन्य संकाय समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। कई विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ होने से पहले ही यह तय कर लिया जाता है कि उस वर्ष कौन से विषय संचालित होंगे, और विद्यार्थियों को उसी पूर्वनिर्धारित ढाँचे में अपना भविष्य चुनने के लिए विवश होना पड़ता है।

नीतियाँ स्वतंत्रता का वादा करती हैं, लेकिन अधूरी व्यवस्थाएँ अक्सर उस स्वतंत्रता को कागज़ों तक सीमित कर देती हैं।

और यह समस्या केवल नीतिगत विरोधाभास तक सीमित नहीं है; इसका सबसे गंभीर स्वरूप विद्यालयों में कुछ महत्वपूर्ण विषयों की अनुपलब्धता के रूप में सामने आता है।

3. गणित और वाणिज्य : क्यों बंद हो रहे हैं अवसरों के सबसे महत्वपूर्ण द्वार

भारतीय विद्यालयी व्यवस्था की सबसे गंभीर किंतु अपेक्षाकृत कम चर्चित चुनौतियों में से एक यह है कि अनेक विद्यालयों में उच्च माध्यमिक स्तर पर गणित एवं वाणिज्य संकाय नियमित रूप से संचालित ही नहीं हो पाते।

विडंबना यह है कि अनेक विद्यालयों में गणित और वाणिज्य जैसे भविष्य-निर्धारक विषय, विशेषज्ञ शिक्षकों की अनुपलब्धता अथवा संस्थागत प्राथमिकता के अभाव के कारण विद्यार्थियों की पहुँच से बाहर बने हुए हैं।

कई परिस्थितियों में विषय विशेषज्ञ शिक्षक कक्षा 11वीं एवं 12वीं स्तर पर अध्यापन करने में रुचि नहीं दिखाते, और कई विद्यालय इन संकायों को प्रारंभ करने की अपेक्षित प्रशासनिक प्राथमिकता ही विकसित नहीं कर पाते।

परिणामस्वरूप हजारों विद्यार्थी उन विषयों तक पहुँच ही नहीं बना पाते जो उनके संभावित करियर की आधारशिला बन सकते थे।

कई बार करियर की पहली बाधा प्रतियोगिता नहीं, बल्कि विद्यालय में अनुपस्थित विषय बन जाता है।

4. एक विद्यार्थी का सपना अक्सर विद्यालय की सीमाओं से हार जाता है :

देश के अनेक छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे विद्यार्थी हैं जो इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, डेटा विशेषज्ञ या वित्त विशेषज्ञ बनने का सपना देखते हैं। लेकिन उनके आसपास उपलब्ध विद्यालयों में गणित या वाणिज्य संकाय ही उपलब्ध नहीं होता।

ऐसी स्थिति में विद्यार्थी के सामने केवल दो विकल्प बचते हैं - या तो वह अपनी वास्तविक रुचि बदल दे, या फिर आर्थिक और सामाजिक सीमाओं के बीच अपने सपनों का आकार छोटा कर दे।

यहीं शिक्षा अवसर का माध्यम बनने के बजाय परिस्थितियों से समझौते का माध्यम बन जाती है।

कभी-कभी असफलता मेहनत की कमी से नहीं, अवसरों की अनुपलब्धता से जन्म लेती है।

5. जब आर्थिक सीमाएँ भी तय करने लगें शिक्षा का रास्ता :

संसाधन-संपन्न परिवार अपने बच्चों को बेहतर विकल्पों के लिए दूसरे विद्यालयों अथवा दूसरे शहरों में भेज सकते हैं। लेकिन ग्रामीण और आर्थिक रूप से सीमित परिवारों के लिए यह हमेशा संभव नहीं होता।

अनेक अभिभावक जानते हैं कि उनके बच्चे की रुचि किसी विशेष विषय में है, लेकिन आर्थिक सीमाएँ उन्हें वैकल्पिक शैक्षणिक अवसर चुनने की अनुमति नहीं देतीं।

कोफ़ी अन्नान ने कहा था - ज्ञान ही वह शक्ति है जो अवसरों को समान बनाती है और समाज को न्यायपूर्ण दिशा देती है।

लेकिन जब अवसरों तक पहुँच असमान हो, तब शिक्षा समानता का माध्यम बनने के बजाय असमानता को स्थायी बना सकती है।

शिक्षा में असमानता केवल विद्यालयों की समस्या नहीं, यह भविष्य के वितरण में असमानता है।

6. प्रतिभा तैयार है, लेकिन व्यवस्था रास्ता नहीं देती :

शिक्षा मनोविज्ञान यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता समान नहीं होती। कोई तार्किक-गणितीय क्षमता में उत्कृष्ट होता है, कोई भाषाई दक्षता में, कोई व्यवसायिक समझ में, तो कोई रचनात्मक अभिव्यक्ति में।

यदि किसी विद्यार्थी को उसकी स्वाभाविक क्षमता और रुचि के अनुरूप विषय चुनने का अवसर नहीं मिलता, तो इसका नुकसान केवल उस विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता; इससे राष्ट्र की सामूहिक प्रतिभा भी सीमित हो जाती है।

जब सही प्रतिभा को सही विषय नहीं मिलता, तब नुकसान केवल विद्यार्थी का नहीं, पूरे राष्ट्र का होता है।

7. नई शिक्षा नीति की असली परीक्षा : विद्यालयों की वास्तविक क्षमता

शिक्षा सुधारों का उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी, लचीला और विकल्प-आधारित बनाना है।

लेकिन यदि विद्यालयों में पर्याप्त विषय विशेषज्ञ शिक्षक, बहुविषयक संरचना, तकनीकी संसाधन और संस्थागत तैयारी विकसित नहीं की जाती, तो नीतियाँ केवल दस्तावेजों तक सीमित रह जाएँगी।

शिक्षा सुधारों का वास्तविक मूल्यांकन सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि विद्यालयों की वास्तविक क्षमता से किया जाना चाहिए।

8. भारत को तय करना होगा : अवसर समान होंगे या भविष्य असमान

भारत आज ज्ञान-आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। भविष्य का संसार कौशल, नवाचार और विशेषज्ञता पर आधारित होगा।

ऐसे समय में यदि लाखों विद्यार्थियों को उनकी पसंद के विषय तक पहुँच ही न मिले, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास क्षमता को सीमित करने वाली एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती है।

कोई भी राष्ट्र उतना ही आगे बढ़ता है, जितनी स्वतंत्रता वह अपने युवाओं को भविष्य चुनने में देता है।

9. सच्ची शिक्षा वही, जहाँ भविष्य का निर्णय विद्यार्थी करे, व्यवस्था नहीं :

किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल विद्यालयों की संख्या, परीक्षा परिणामों या नीतिगत घोषणाओं से नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक विद्यार्थी को अपने भविष्य का चुनाव स्वयं करने की वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त है।

जब विद्यालयों की संरचनात्मक सीमाएँ विद्यार्थियों के सपनों की दिशा तय करने लगती हैं, तब यह केवल शिक्षा व्यवस्था की समस्या नहीं रहती — यह राष्ट्र की संभावनाओं पर लगाया गया एक अदृश्य प्रतिबंध बन जाती है।

यदि शिक्षा व्यवस्था यह तय करने लगे कि विद्यार्थी क्या पढ़ सकता है, तो यह केवल विकल्पों का संकट नहीं — यह संभावनाओं का मौन दमन है

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि विषय चयन का अधिकार केवल नीति की भाषा न रहे, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की वास्तविक स्वतंत्रता बने।

किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी विफलता तब होती है, जब उसकी व्यवस्था अपनी प्रतिभाओं की दिशा तय करने लगे।

क्योंकि अंततः - जहाँ अवसर सीमित होते हैं, वहाँ भविष्य प्रतिभा नहीं, परिस्थितियाँ तय करती हैं।

10. संदर्भ सूची :

भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय (2020). राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020 नई दिल्ली : शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT). विद्यालयी शिक्षा, पाठ्यचर्या संरचना एवं विषय चयन संबंधी राष्ट्रीय दिशा-निर्देश। नई दिल्ली : एनसीईआरटी।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE). उच्च माध्यमिक शिक्षा में विषय संरचना, संकाय संचालन एवं विद्यालयी प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देश। नई दिल्ली : सीबीएसई।

स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, भारत सरकार. विद्यालयी शिक्षा में समान अवसर, पहुँच एवं समावेशी शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय दस्तावेज। नई दिल्ली : शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

यूनेस्को (UNESCO) (2021). शिक्षा का भविष्य : वैश्विक सामाजिक अनुबंध की नई परिकल्पना पेरिस : यूनेस्को।

OECD (आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन) (2018). भविष्य की शिक्षा और कौशल रूपरेखा – शिक्षा 2030 ढांचा पेरिस : OECD प्रकाशन।

हावर्ड गार्डनर (1983)। फ्रेम्स ऑफ माइंड: द थ्योरी ऑफ मल्टीपल इंटेलिजेंस। न्यूयॉर्क: बेसिक बुक्स (बहु-बुद्धिमत्ता सिद्धांत एवं विद्यार्थी क्षमता विविधता पर आधारित प्रमुख ग्रंथ)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC). भारतीय शिक्षा में बहुविषयक शिक्षा, लचीले पाठ्यक्रम एवं विकल्प-आधारित अधिगम संबंधी दिशा-निर्देशन नई दिल्ली : यूजीसी।

भारतीय विद्यालयी शिक्षा पर राष्ट्रीय शैक्षिक सर्वेक्षण रिपोर्टें - विद्यालयों में संसाधन उपलब्धता, विषय संरचना, शिक्षक उपलब्धता एवं क्षेत्रीय शैक्षिक असमानताओं पर आधारित अध्ययन रिपोर्टें।

समकालीन शिक्षा मनोविज्ञान एवं शिक्षा समाजशास्त्र संबंधी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध अध्ययन - विद्यार्थी अभिरुचि, विषय चयन, अवसर असमानता, ग्रामीण शिक्षा संरचना एवं करियर विकल्पों पर आधारित शोध साहित्य।

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