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Abhyuday Bharat News / Sat, Jun 20, 2026 / Post views : 3
सुप्रीम कोर्ट ने हादसे के मामले में सुनवाई करते हुए फुटपाथों की सुरक्षा और निर्माण के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। अदालत ने कहा कि पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों से ऊपर है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क हादसे के मामले में सुनवाई करते हुए ये अहम फैसला सुनाया है। इस दर्दनाक सड़क हादसे में पिता ने अपने पांच साल के मासूम बेटे को उस वक्त खो दिया था, जब वो उसे स्कूल लेकर जा रहे थे। इस मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को कम कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पवार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोरर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए मृतक बच्चे के पिता के लिए मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस बढ़ी हुई राशि का भुगतान दो महीने के भीतर हर हाल में किया जाए।
पैदल चलना मौलिक अधिकार
स्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की बेंच मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत एक मौलिक अधिकार है। ये अधिकार संविधान के आर्टिकल 19(1)(d) के तहत मिलने वाले ‘देश में कहीं भी आने-जाने के अधिकार’ का एक अहम हिस्सा है। बेंच ने अपने आदेश में लिखा-पैदल चलने के इस बुनियादी अधिकार के दायरे में निर्धारित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है. ये अधिकार प्राथमिक है और इसे सड़कों पर चलने वाले मोटर वाहनों के मुकाबले तरजीह दी जाएगी।
केंद्र सरकार से मांगा कानूनी ढांचा
इस मामले में केंद्र सरकार को आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के जरिए पक्षकार बनाया गया है। अदालत ने इस पूरे विषय में कानूनी सहायता के लिए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) केएम नटराज को भी आमंत्रित किया है। साथ ही ऐतिहासिक फैसले को जमीन पर लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी पहल की है। कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि वो इस फैसले की कॉपी देश के सभी केंद्रीय मंत्रालयों और लॉ कमिशन को भेजें, ताकि इसके लिए एक जरूरी और मजबूत कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को एक नए शीर्षक Re: Fundamental Right to Walk and Footpath के तहत रजिस्टर करने का आदेश दिया है।
मोटर व्हीकल एक्ट में बदलाव की जरूरत
देश के शीर्ष न्यायालय ने मौजूदा कानून की कमियों पर भी उंगली उठाई है। अदालत ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 ने कभी भी पैदल चलने वालों के मौलिक अधिकार को नहीं पहचाना। हकीकत तो ये है कि ये कानून कई मायनों में पैदल चलने वालों के अधिकारों के रास्ते में एक रुकावट साबित हुआ है। ये पूरा कानून गाड़ियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जबकि इंसान के हित इसमें सिर्फ एक सहायक या गौण हिस्सा थे। इसमें पैदल चलने वालों का अधिकार सिर्फ इतना ही था कि गाड़ियां उनसे बचकर निकल जाएं।
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