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शिक्षक का आज, शिक्षा का कल : बदलती कक्षा, बढ़ती अपेक्षाएँ और शिक्षा के भविष्य की नई दिशा

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शिक्षा : शिक्षक का आज, शिक्षा का कल : बदलती कक्षा, बढ़ती अपेक्षाएँ और शिक्षा के भविष्य की नई दिशा

Abhyuday Bharat News / Sun, Oct 11, 2026 / Post views : 368

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✍️ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

(Educationist, DMIT Expert and Psychometric counsellor)

किसी देश का भविष्य केवल संसदों, सचिवालयों और नीति पत्रों में तय नहीं होता। उसका एक बड़ा हिस्सा उन कक्षाओं में आकार लेता है, जहाँ हर दिन शिक्षक और विद्यार्थी आमने सामने होते हैं। कभी किसी बच्चे का छोटा सा प्रश्न पूरी कक्षा को सोचने के लिए विवश कर देता है, तो कभी शिक्षक का एक सहज प्रोत्साहन किसी संकोची विद्यार्थी को पहली बार अपनी बात कहने का साहस देता है। कई बार शिक्षक को स्वयं भी पता नहीं चलता कि उसका कहा हुआ कोई साधारण वाक्य किसी बच्चे के जीवन में कितनी दूर तक साथ चलता रहेगा।

शिक्षक की यही भूमिका उसे केवल एक कर्मचारी या विषय विशेषज्ञ से अलग करती है। हम उसे राष्ट्र निर्माता कहते हैं। लेकिन इस सम्मानजनक संबोधन के साथ एक जरूरी सवाल भी जुड़ा है कि जिस शिक्षक से हम भविष्य गढ़ने की अपेक्षा करते हैं, उसके वर्तमान को हम कितना मजबूत बना रहे हैं?

आज के शिक्षक की स्थिति को समझने के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षक को केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं माना गया। तैत्तिरीय उपनिषद् का प्रसिद्ध निर्देश है आचार्यदेवो भव। इसमें शिक्षक के सम्मान के साथ उसके आचरण और दायित्व की गरिमा भी निहित है। समय बदला है, कक्षा बदली है, सीखने के साधन बदले हैं; लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास का महत्व कम नहीं हुआ।

बदला है तो शिक्षक के काम का दायरा। आज उसे अधिक जटिल परिस्थितियों के बीच पढ़ाना है, सीखना है और विद्यार्थियों को सीखने के लिए तैयार करना है।

1. सम्मान के शब्द, जिम्मेदारियों का बोझ :

आज शिक्षक का काम केवल कक्षा लेने तक सीमित नहीं है। पाठ की तैयारी, शिक्षण, मूल्यांकन, अभिलेख, विद्यालयी गतिविधियाँ, अभिभावकों से संवाद, डिजिटल साधनों का उपयोग और प्रशिक्षण; इन सबके बीच उसे विद्यार्थी के लिए पर्याप्त समय भी निकालना होता है।

विद्यार्थी की दुनिया भी बदल गई है। उसकी शैक्षणिक कठिनाइयों के साथ भावनात्मक उलझनें, भविष्य को लेकर असमंजस और सामाजिक दबाव भी सामने आते हैं। स्वाभाविक है कि शिक्षक से अपेक्षा की जाए कि वह बच्चे को समझे और उसका मार्गदर्शन करे।

लेकिन अपेक्षा और अति अपेक्षा के बीच एक महीन रेखा होती है। शिक्षक संवेदनशील मार्गदर्शक अवश्य हो, पर हर समस्या का अकेला समाधानकर्ता नहीं।

जब शिक्षण के साथ लगातार ऐसे दायित्व जुड़ते जाते हैं जिनके लिए अलग विशेषज्ञता और अलग व्यवस्था चाहिए, तो सबसे पहले प्रभावित होता है कक्षा में मिलने वाला वह समय, जो विद्यार्थी के सीखने के लिए सबसे मूल्यवान है।

एक अच्छे शिक्षक को केवल संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। उसे पाठ की तैयारी का समय, विद्यार्थियों को समझने का समय, स्वयं सीखने का समय और नए प्रयोगों के बारे में सोचने का अवकाश भी चाहिए।

इसलिए शिक्षक की चिंता केवल वेतन और सुविधाओं की चिंता नहीं है। यह कार्यभार, समय, पेशेवर स्वायत्तता, मानसिक संतुलन और सामाजिक गरिमा की चिंता भी है।

2. बच्चा बदल गया है, तो कक्षा क्यों न बदले? :

आज का विद्यार्थी ऐसी दुनिया में रह रहा है जहाँ जानकारी पाने के लिए उसे हमेशा शिक्षक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। एक मोबाइल फोन पर उसे किसी विषय से जुड़ी अनेक व्याख्याएँ, चित्र, वीडियो और मत मिल जाते हैं।

ऐसे समय में शिक्षक की आवश्यकता कम नहीं हुई; उसकी भूमिका का स्वरूप बदल गया है।

अब शिक्षक का महत्व केवल इस बात में नहीं कि वह कितनी सूचनाएँ याद रखता है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह विद्यार्थी को सूचना और ज्ञान के बीच का अंतर समझा सके।

इंटरनेट पर उपलब्ध हर जानकारी सही नहीं होती। हर आकर्षक प्रस्तुति ज्ञान नहीं देती और हर आत्मविश्वास से कही गई बात सत्य नहीं होती। ऐसे समय में बच्चे को प्रश्न करना, प्रमाण खोजना, तर्क परखना और किसी सूचना को स्वीकार करने से पहले ठहरकर सोचना सिखाना शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी है।

इस अर्थ में शिक्षक अब केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, विवेक का मार्गदर्शक है।

इसलिए आधुनिक कक्षा की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितना पाठ पूरा हुआ। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विद्यार्थी ने कितना सोचा, कितना पूछा और उस सीखने के बाद दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में क्या नया जुड़ा।

3. अंकों से आगे, सीखने की ओर :

हमारी शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक परीक्षा और अंकों के इर्द गिर्द घूमती रही है। अंक आवश्यक हैं, लेकिन वे बच्चे की पूरी तस्वीर नहीं बताते।

किसी विद्यार्थी ने परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किए, यह महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या वह अपने विचार स्पष्ट कर सकता है? क्या वह दूसरों के साथ मिलकर काम कर सकता है? क्या वह गलती से सीख सकता है? क्या उसमें रचनात्मकता, संवेदनशीलता और आत्मचिंतन की क्षमता है?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक समग्र, अनुभवात्मक, विद्यार्थी केंद्रित और दक्षता आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रस्तुत की है। PARAKH की समग्र प्रगति पत्रिका भी विद्यार्थी के विकास को केवल परीक्षा अंकों तक सीमित न रखकर उसके विभिन्न विकासात्मक पक्षों को समझने की दिशा में आगे बढ़ती है।

यह बदलाव केवल मूल्यांकन की पद्धति का बदलाव नहीं है। यह शिक्षा की मूल सोच में परिवर्तन है। सवाल अब केवल यह नहीं रह गया है बच्चे ने कितना याद किया?

सवाल यह भी है कि सीखने की इस प्रक्रिया ने बच्चे को कितना विकसित किया? और इस प्रश्न का उत्तर सबसे निकट से देने वाला व्यक्ति शिक्षक ही है।

4. कक्षा में शिक्षक की असली भूमिका :

एक कक्षा में बैठे सभी विद्यार्थी एक जैसे नहीं होते। किसी को विषय जल्दी समझ में आता है, किसी को थोड़ा अधिक समय चाहिए। कोई सहज होकर प्रश्न पूछता है, तो कोई अपनी बात कहने में झिझकता है। किसी के पास घर का पर्याप्त सहयोग है, तो कोई अपनी निजी परिस्थितियों से जूझते हुए विद्यालय पहुँचता है।

इसलिए शिक्षण केवल पाठ्यपुस्तक के पन्नों और श्यामपट्ट के बीच होने वाली प्रक्रिया नहीं है। बच्चे को पढ़ाने से पहले उसे देखना और समझना भी पड़ता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

विद्यार्थी शिक्षक के शब्द सुनता है, लेकिन उसके व्यवहार को भी देखता है। शिक्षक गलती पर विद्यार्थी को अपमानित करता है या समझाता है, प्रश्न पूछने वाले को प्रोत्साहित करता है या रोकता है, अपनी बात थोपता है या संवाद करता है ये सब भी शिक्षा का हिस्सा बन जाते हैं।

इसलिए शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता। कई बार वह बिना कहे भी बहुत कुछ सिखा रहा होता है।

5. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में शिक्षक: विकल्प नहीं, मानवीय शक्ति :

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा के सामने संभावनाओं का नया संसार खोला है। सीखने की गति के अनुसार सामग्री तैयार करना, अभ्यास उपलब्ध कराना, त्वरित प्रतिक्रिया देना और शिक्षण सहायता उपलब्ध कराना अब अधिक सहज हो सकता है।

लेकिन तकनीक के विस्तार के साथ एक स्वाभाविक प्रश्न भी सामने आया है कि क्या मशीन कभी शिक्षक की जगह ले सकती है? शायद यह सबसे जरूरी प्रश्न नहीं है।

एक विद्यार्थी का उत्तर गलत हो सकता है, लेकिन उसके पीछे छिपा प्रयास सही दिशा में हो सकता है। कोई बच्चा लगातार चुप रह सकता है और शिक्षक समझ सकता है कि समस्या विषय की समझ से अधिक आत्मविश्वास की है। किसी विद्यार्थी को एक और अवसर की जरूरत हो सकती है।

तकनीक इन प्रक्रियाओं में सहायता कर सकती है, लेकिन मानवीय संबंध का स्थान लेना उसके लिए आसान नहीं होगा।

इसलिए भविष्य का प्रश्न शिक्षक बनाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि शिक्षक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिलकर शिक्षण को कितना बेहतर…

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