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उत्तर प्रदेश :- गाजियाबाद न्यूज : 13 साल लंबी रात और नींद से उठाने में जब मेडिकल केयर फेल; सुप्रीम कोर्ट के इच्छामृत्यु पर फैसले का क्या है अर्थ?

Abhyuday Bharat News / Fri, Mar 13, 2026 / Post views : 185

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सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल से ज्यादा समय से कोमा में वेंटिलेटर के सहारे सांस ले रहे हरीश राणा को ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दे दी। हरीश राणा 20 अगस्त 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके माता-पिता की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश दिया। जानें इस फैसले का अर्थ।

मेडिकल जगत के सबसे कठिन नैतिक प्रश्नों में से एक पर पुनर्विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने 31 वर्षीय हरीश राणा के कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति दी, जो 13 साल से अधिक समय से कोमा में थे। हरीश राणा मामले में यह निर्णय पहली बार है जब अदालत ने स्थायी रूप से कोमा में पड़े मरीज के लिए इच्छामृत्यु की सीधी अनुमति दी है। एम्स की पूर्व प्रमुख और ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन की प्रोफेसर डॉ. सुषमा भटनागर ने TOI को बताया कि चिकित्सा जगत में इसका क्या अर्थ है और डॉक्टर यह कैसे तय करते हैं कि जीवन रक्षक प्रणाली कब हटाई जानी चाहिए।

मेडिकल जगत में इच्छामृत्यु का क्या अर्थ है?

सरल शब्दों में, इसमें जीवन रक्षक प्राणली को हटाना शामिल है, यानी कृत्रिम सहायता के कुछ रूपों को रोकना जो मरीज की स्थिति में सुधार किए बिना जीवन को लंबा खींचते हैं। उदाहरण के लिए, डॉक्टर कृत्रिम पोषण, तरल पदार्थ या अन्य जीवनरक्षक उपायों को तब रोक सकते हैं जब वे लाभकारी न रह जाएं। इसका उद्देश्य जीवन को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उन इलाजों को रोकना है जो केवल पीड़ा को बढ़ाते हैं, और जब ठीक होना संभव न हो तो बीमारी को अपने आप ठीक होने देना है।

किन परिस्थितियों में डॉक्टर लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने पर विचार करते हैं?

डॉक्टर ऐसा तब करते हैं जब इलाज के दौरान मरीज को कोई फायदा नहीं हो रहा होता और उसकी पीड़ा ही बढ़ रही होती है। ऐसे केस में, मेडिकल सहायता जारी रखना मरीज के हित में नहीं हो सकता। इन परिस्थियों में स्थायी कोमा जैसी स्थिति, गंभीर और अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति, लाइलाज कैंसर, अंतिम चरण की किडनी फेल्योर जहां डायलिसिस भी प्रभावी नहीं है, या हृदय रोग जहां उपचार के सभी विकल्प समाप्त हो चुके हैं, ऐसे केस शामिल हो सकते हैं। इसमें वेंटिलेटर सपोर्ट हटाना, ब्लड प्रेशर को आर्टिफिशियल रूप से बनाए रखने वाली दवाओं को बंद करना, डायलिसिस, ट्यूबों के माध्यम से आर्टिफिशिय खाना देना, या अन्य हस्तक्षेप शामिल हो सकते हैं जो मरीज की स्थिति में सुधार किए बिना शारीरिक कार्यों को बनाए रखते हैं।

डॉक्टर यह कैसे निर्धारित करते हैं कि किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, और भारत में लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने से पहले किन सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए?

इसके लिए स्थापित मेडिकल मानदंड और टेस्ट हैं। उदाहरण के लिए, कोमा या कोमा जैसी स्थितियों की पुष्टि करने के लिए विशिष्ट उपकरणों का उपयोग किया जाता है। उन्नत कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों में, इसका पूर्वानुमान और ठीक होने की संभावना का आकलन साक्ष्य-आधारित मेडिकल दिशानिर्देशों का उपयोग करके किया जाता है। भारत में, आमतौर पर कोई भी निर्णय लेने से पहले प्राथमिक और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड से समीक्षा की जाती है। कुछ मामलों में, यह सुनिश्चित करने के लिए अस्पताल की नैतिक समितियां भी शामिल हो सकती हैं कि प्रक्रिया मेडिकल नैतिकता और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से निर्धारित कानूनी दिशानिर्देशों का पालन करती है। ये उपाय सुनिश्चित करते हैं कि फैसला मेडिकली उचित और नैतिक रूप से सही है।

लिविंग विल या एडवांस डायरेक्टिव कितने महत्वपूर्ण हैं?

ये बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर किसी मरीज ने पहले से ही स्पष्ट रूप से बता दिया है कि ऐसी परिस्थितियों में वह किस प्रकार का इलाज चाहता है या नहीं चाहता है, तो डॉक्टर और परिवार उसकी इच्छाओं का पालन कर सकते हैं। मरीज की स्वायत्तता का सम्मान करना मेडिकल नैतिकता का एक मूलभूत सिद्धांत है।

भारत में डॉक्टरों को लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने के अनुरोध कितनी बार मिलते हैं?

भारत में यह अभी भी अपेक्षाकृत दुर्लभ है। एडवांस डायरेक्टिव के बारे में जागरूकता सीमित है। सांस्कृतिक रूप से, कई परिवारों को मृत्यु को जीवन के एक स्वाभाविक हिस्से के रूप में स्वीकार करना कठिन लगता है।

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में क्या अंतर है और निष्क्रिय इच्छामृत्यु, असिस्टेड सुसाइड या असिस्टेड मृत्यु से कैसे भिन्न है?

एक्टिव इच्छामृत्यु में जानबूझकर दवाइयां देकर मौत का कारण बनना शामिल है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु का तात्पर्य उन इलाजों को बंद करना या रोकना है जो आर्टिफिशियली जीवन को बनाए रखते हैं और उन मेडिकल हस्तक्षेप को रोकना है जो अब लाभकारी नहीं हैं। असिस्टेड आत्महत्या में किसी व्यक्ति को अपना जीवन समाप्त करने में सक्रिय रूप से सहायता करना शामिल है। आमतौर पर उसे दवाइयां प्रदान करके जिन्हें वह व्यक्ति स्वयं लेता है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बारे में कुछ आम गलत धारणाएं क्या हैं?

कई लोग मानते हैं कि इसका मतलब है कि डॉक्टर किसी मरीज की जान लेने की सक्रिय कोशिश कर रहे हैं। असल में, इसमें आमतौर पर उन मेडिकल प्रक्रियाओं को रोकना शामिल होता है जो अब उपयोगी नहीं हैं और जीवन के अंतिम समय में आराम, देखभाल और गरिमा पर ध्यान केंद्रित करना होता है।

मेडिकल नैतिकता के दृष्टिकोण से, इन प्रक्रियाओं को अलग-अलग क्यों माना जाता है?

मेडिकल नैतिकता नुकसान न पहुंचाने और उन उपचारों से बचने पर जोर देती है जिनसे कोई फायदा नहीं होता। जब इलाज केवल पीड़ा को बढ़ाता है और ठीक होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं होती, तो उसे बंद करना नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है।

जीवन के अंत के सवाल पर भारत का रुख

2011 :सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु को अस्वीकार कर दिया, जो 1973 में एक क्रूर हमले के बाद से कोमा में थीं, लेकिन सख्त सुरक्षा उपायों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिससे भारत में इस अवधारणा को पहली बार कानूनी मान्यता मिली।
2015 :
शानबाग का 42 साल बाद निधन हो गया, उन्होंने चार दशक कोमा में बिताए।
2018 :
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है और लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) की अनुमति दी।
2023 :
सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रियाओं को सरल बनाया, दो-स्तरीय मेडिकल बोर्ड सिस्टम शुरू की और पहले की प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम किया।
2026 :
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में कृत्रिम जीवन रक्षक यंत्र हटाने की अनुमति दी, जो भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला कोर्ट-अनुमोदित कार्यान्वयन है।

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