Thu, 28 May 2026
Logo

ब्रेकिंग

SC के SIR पर फैसले से चुनाव आयोग बहुत खुश हुआ, असली वजह हैं, संविधान का अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व कानून

ग्रामीण विकास को मिलेगी नई रफ्तार- 1 जुलाई से लागू होगा वीबी-जी-राम-जी मिशन, अब मिलेगा 125 दिनों का गारंटीड रो

’बारनवापारा के देवपुर जंगल में दिखी दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी’

रायपुर : ’तेन्दूपत्ता संग्रहण में छत्तीसगढ़ ने बनाया नया रिकॉर्ड, अब तक 13.52 लाख मानक बोरा संग्रहित’

रायपुर : भीषण गर्मी में सतर्कता और संवेदनशीलता बरतें, जरूरतमंदों का सहारा बनें - मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

प्रगतिशील सतनामी समाज के द्वारा मस्तूरी में 31 मई को कार्यक्रम आयोजित

अग्निवीर में चयनित युवाओं का सम्मान

लगातार दूसरी बार आईपीएल के फाइनल में पहुंची बेंगलुरु, गुजरात को 92 रन से दी करारी शिकस्त, बल्लेबाजों के बाद गेंदबाजों ने

रणवीर सिंह पर FWICE का बैन, ‘डॉन 3’ छोड़ने के फैसले से मचा बॉलीवुड में हंगामा

टीएमसी में भगदड़ः 50 विधायक और 20 सांसद पाला बदलने को तैयार, एक दिन पहले 101 पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफा दिया था

सूचना

उत्तर प्रदेश :- वाराणसी न्यूज : कौन थे बाबू जगत सिंह? सारनाथ की खोज में बड़ी भूमिका, ASI ने अंग्रेजों के ऊपर दी मान्यता..

Abhyuday Bharat News / Wed, Mar 11, 2026 / Post views : 112

Share:

सारनाथ से जुड़ी ऐतिहासिक गलती में सुधार किया गया है। सारनाथ की खोज की कहानी बदल गई है। एएसआई ने बाबू जगत सिंह की भूमिका को मान्यता दे दी है।

वाराणसी: सारनाथ की खोज किसने की? इस सवाल को लेकर गरमाते मुद्दे के बीच आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से स्थिति स्पष्ट की गई है। इसके साथ ही वाराणसी के सारनाथ के इतिहास में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। लंबे समय से यह माना जा रहा है कि सारनाथ की पहचान और यहां के प्राचीन अवशेषों का पता अंग्रेजों ने लगाया था ,लेकिन अब नए शोध और प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर इस धारणा में बदलाव हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है सारनाथ का इतिहास सबसे पहले बाबू जगत सिंह की ओर से कराए गए उत्खनन के बाद सामने आया था।

एएसआई की मान्यता के आधार पर सारनाथ परिसर में लगे शिलापट्‌ट को भी संशोधित कर दिया गया है। इतिहास के इस तथ्य को सही रूप से प्रस्तुत किया जा सके, इसके लिए यह निर्णय हुआ है। दरअसल, एएसआई की मान्यता से साफ हुआ है कि बाबू जगत सिंह के प्रयासों को अंग्रेजों की ओर से दबा दिया था। सारनाथ की खोज का क्रेडिट उन्हें नहीं दिया गया। शिलापट्‌ट से बाबू जगत सिंह का नाम गायब कर दिया गया। अब लंबी लड़ाई के बाद भारतीय पुरातत्व विभाग ने अंग्रेजों की इस साजिश पर विराम लगाते हुए बाबू जगत सिंह के प्रयासों को मान्यता दे दी है।

पहले अंग्रेजों का नाम था दर्ज

वाराणसी के विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल सारनाथ को लेकर लंबे समय से मान्यता थी कि यहां की पहचान और प्राचीन अवशेषों की खोज ब्रिटिश अधिकारियों जोनाथन डंकन और कर्नल मैकेंजी ने कराई थी। हालांकि, अब नई शोध और प्रमाणिक दस्तावेजों ने इस धारणा को बदल दिया है। एएसआई ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व सबसे पहले बाबू जगत सिंह की ओर से कराए गए उत्खनन के बाद सामने आया था। इसी आधार पर सारनाथ परिसर में लगे शिलापट्ट को भी संशोधित कर दिया गया है।


प्रदीप नारायण सिंह ने दी जानकारी

वाराणसी के जगतगंज राजपरिवार के प्रतिनिधि और बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी से जुड़े प्रदीप नारायण सिंह ने इस संबंध में जानकारी दी है। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि लंबे समय से उनके पूर्वजों के ऐतिहासिक योगदान को लेकर शोध और प्रमाण जुटाने का कार्य चल रहा था। अब एएसआई ने इसे औपचारिक मान्यता दे दी है। उन्होंने कहा कि एक बाबू जगत सिंह ने अंग्रेजों का विरोध किया था। एक विद्रोही को वे महिमामंडित तो कर नहीं सकते थे। ऐसे में उन लोगों ने जितना बदनाम करना था, किया। आज सारी चीजें प्रमाण के तौर पर सामने आ गई हैं।

प्रदीप सिंह ने कहा कि सारनाथ के इतिहास को सही तरीके से सामने लाने के लिए हमलोगों ने अथक प्रयास किया। हमारी रिसर्च टीम के लोगों ने मिलकर काम किया। यह मेरा एकल प्रयास नहीं है। यह सब लोगों के प्रयास का परिणाम है। आप लोगों का सहयोग है। आज का यह दिन ईश्वर एवं बाबा विश्वनाथ की कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद से आया है।


कौन थे जगत सिंह?

बाबू जगत सिंह वाराणसी के शासक थे। 18वीं शताब्दी के आखिर में बाबू जगत सिंह ने सारनाथ के इलाके को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना। इसके बाद यहां खनन का कार्य शुरू कराया गया। उस दौर में क्षेत्र में प्राचीन अवशेषों की उपस्थिति की जानकारी बहुत कम थी। बाबू जगत सिंह के प्रयासों से यहां के कई महत्वपूर्ण अवशेषों का पता चला। उस दौर में संसाधनों और तकनीक की सीमाओं के बाद भी उनके प्रयासों ने सारनाथ के ऐतिहासिक महत्व को दुनिया के सामने लाया।

हालांकि, बाद के वर्षों में ब्रिटिश अधिकारियों ने भी सारनाथ में रुचि दिखाई। यहां सर्वेक्षण और स्टडी शुरू किया गया। इस कारण उस समय इतिहास लेखन में उनके योगदान को प्रमुखता मिल गई। वहीं, बाबू जगत सिंह के प्रयासों को पीछे धकेल दिया गया। हालांकि, अब ताजा रिसर्च के बाद बाबू जगत सिंह के शोध को मान्यता मिल गई है।

Tags :

#uttarpradesh

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

जरूरी खबरें

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

Related Posts