शनिवार बदलेगा स्कूल की तस्वीर: किताबों से आगे, जीवन की ओर बढ़ता अधिगम
अनुभव, कौशल, जीवन कौशल और करियर शिक्षा के जरिए विद्यालय को पाठ्यपुस्तक से वास्तविक दुनिया से जोड़ने की पहल
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )
शनिवार की सुबह है। स्कूल की घंटी बजती है। बच्चे कक्षाओं में पहुँचते हैं। लेकिन आज मेज पर केवल किताबें नहीं हैं। कहीं बच्चे किसी स्थानीय समस्या पर चर्चा कर रहे हैं, कहीं कोई प्रयोग तैयार हो रहा है, कहीं परिवार का बजट बनाया जा रहा है और कहीं कोई विद्यार्थी पहली बार अपने भविष्य के बारे में गंभीरता से सोच रहा है।
शिक्षक पूछता है तुम्हें क्या लगता है, ऐसा क्यों होता है? एक बच्चा अनुमान लगाता है। दूसरा असहमति जताता है। तीसरा नया सवाल पूछता है। बातचीत आगे बढ़ती है। शायद यहीं से सीखना शुरू होता है।
क्योंकि शिक्षा हमेशा उस क्षण शुरू नहीं होती, जब शिक्षक उत्तर बता देता है। कई बार वह उस क्षण शुरू होती है, जब बच्चे के मन में कोई नया प्रश्न जन्म लेता है।
यही सोच शनिवार को विद्यालयी जीवन का एक अलग अवसर बनाने की आधारभूमि तैयार करती है। जहां शैक्षणिक वर्ष के 40 शनिवारों को; 120 अनुभवात्मक अधिगम कालखंडों और 40 प्रेरक सत्रों में विभाजित किया जाना चाहिए। जिसमें योग, व्यायाम, खेल और मानसिक कल्याण के साथ खोजो, अनुभव करो और सृजन करो की क्रमिक अधिगम यात्रा रखी जानी चाहिए।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि शनिवार को क्या कराया जाएगा। सवाल यह है कि स्कूल में सीखने का अनुभव कैसा होगा।
1. बच्चा किताब पढ़ता है, लेकिन जीवन को कैसे पढ़ेगा? :
स्कूल बच्चे को पढ़ना, लिखना, गणना करना और विषयों को समझना सिखाता है। यह शिक्षा की बुनियाद है। लेकिन जीवन आगे उससे कुछ और माँगता है।
वहाँ कोई अध्याय संख्या नहीं होती। वहाँ समस्या सामने आती है और समाधान खोजना पड़ता है। किसी से मतभेद हो तो संवाद करना पड़ता है। सीमित संसाधनों में प्राथमिकता तय करनी पड़ती है। असफलता मिले तो खुद को संभालना पड़ता है। नया अवसर मिले तो निर्णय लेना पड़ता है।
इसलिए शिक्षा के सामने आज एक गहरा प्रश्न है; क्या हम बच्चों को केवल सही उत्तर दे रहे हैं, या उन्हें सही प्रश्न पूछना भी सिखा रहे हैं?
पाठ्यपुस्तक जरूरी है, लेकिन वह जीवन नहीं है।
गणित परिवार के बजट से जुड़ सकता है। विज्ञान स्थानीय पर्यावरण की समस्या से। भाषा वास्तविक संवाद और अभिव्यक्ति से। नागरिक शास्त्र समुदाय की जिम्मेदारियों से।
इसी दृष्टि से प्रत्येक शनिवार में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, कला एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, करियर जागरूकता, वित्तीय साक्षरता और सामुदायिक सहभागिता जैसे अनुभवों को शामिल किया चाहिए।
किताब ज्ञान का आधार है; अनुभव उस ज्ञान को जीवन में उपयोग करना सिखाता है।
शनिवार जब कक्षा थोड़ी खुल जाए तब कल्पना कीजिए, शिक्षक कहे आज पहले बाहर चलकर देखते हैं।
बच्चे स्कूल के आसपास की मिट्टी देखते हैं। कोई पानी के उपयोग पर सवाल करता है। कोई आँकड़े इकट्ठे करता है। कोई पौधों की स्थिति दर्ज करता है। फिर वे वापस आते हैं और अपने निष्कर्ष पर चर्चा करते हैं।
यहाँ एक सही उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण है देखना, पूछना, करना और समझना। इस प्रक्रिया को खोजो, अनुभव करो और सृजन करो के तीन चरणों में व्यवस्थित किया जाना चाहिए। पहले विद्यार्थी जिज्ञासा और प्रश्न के साथ विषय को देखें, फिर स्वयं अनुभव करें और अंततः उस अनुभव को मॉडल, प्रस्तुति, उत्पाद, समाधान या परियोजना के रूप में व्यक्त करें।
इसके बाद एक और सवाल जरूरी है तुमने क्या सीखा? प्रेरक सत्र के बाद आत्मचिंतन, प्रश्नोत्तर और अधिगम रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण है।
गतिविधि तभी अधिगम बनती है, जब विद्यार्थी उसके बाद स्वयं से पूछता है मैंने क्या सीखा?
2. हर बच्चे के भीतर एक संभावना होती है :
हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। किसी को विज्ञान आकर्षित करता है, किसी को चित्र बनाना। कोई लोगों से बात करने में सहज है। कोई चीजों को खोलकर समझना चाहता है। कोई कहानी लिखता है। कोई नेतृत्व करता है। कोई चुप रहता है, लेकिन अवसर मिलने पर असाधारण काम करता है।
विद्यालय की चुनौती है कि वह इन अलग अलग संभावनाओं को पहचान सके।
आत्म पहचान, प्रभावी संचार और भावनात्मक बुद्धिमत्ता से लेकर कला, संस्कृति और कौशल विकास तक ऐसे अनुभव होने चाहिए जो विद्यार्थी को स्वयं को समझने और अपनी क्षमताओं को आजमाने का अवसर देते हैं।
शायद किसी बच्चे के लिए शनिवार का सबसे बड़ा अनुभव कोई मॉडल बनाना न हो। शायद वह पहली बार यह समझे मैं भी यह कर सकता हूँ।
शिक्षा में यह छोटा सा विश्वास बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
3. करियर का पहला सवाल क्या बनोगे? नहीं, कौन हो? :
हम बच्चों से अक्सर पूछते हैं बड़े होकर क्या बनोगे?डॉक्टर? इंजीनियर? शिक्षक? अधिकारी?
लेकिन उससे पहले कुछ और पूछा जाना चाहिए
तुम्हें किस काम में आनंद आता है?
तुम किस समस्या को हल करना चाहते हो?
तुम्हारी ताकत क्या है?
शनिवार को भारत और दुनिया के प्रमुख करियर विकल्पों से परिचय, रुचि एवं योग्यता की पहचान और व्यक्तिगत करियर रोडमैप बनाने जैसी गतिविधियाँ रखी जानी चाहिए।
करियर तब अधिक सार्थक बनता है, जब वह किसी बच्चे पर थोपा हुआ सपना न होकर उसकी अपनी खोज बने।
करियर का चुनाव केवल पेशा चुनना नहीं; अपने लिए एक अर्थपूर्ण दिशा चुनना है।
4. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समय में सबसे जरूरी चीज शायद ‘उत्तर’ नहीं है :
आज का बच्चा ऐसी दुनिया में बड़ा हो रहा है जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में अनेक प्रश्नों के उत्तर दे सकती है।
तो स्कूल क्या सिखाए? शायद उससे भी अधिक जरूरी, उत्तर पर विचार करना।
क्या यह जानकारी सही है? इसका स्रोत क्या है? क्या इसका कोई दूसरा पक्ष भी है? क्या मशीन का उत्तर हमेशा उचित है? और यदि तकनीक मेरे लिए कुछ कर सकती है, तो मैं उसके साथ मिलकर क्या नया कर सकता हूँ?
शनिवार को एआई के परिचय, दैनिक जीवन और करियर में उसके उपयोग, एआई की नैतिकता और जिम्मेदार उपयोग को शामिल किया जाना चाहिए। मीडिया एवं सूचना साक्षरता में स्रोतों की जाँच और फेक न्यूज़ की पहचान को भी अनुभवात्मक गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए।
जब मशीनें उत्तर देने लगें, तब इंसान को और भी बेहतर प्रश्न पूछना सीखना होगा।
5. क्या अंक बता सकते हैं कि बच्चा सचमुच सीख रहा है? :
रिपोर्ट कार्ड पर 42, 71 या 86 लिखा हो सकता है। लेकिन उन अंकों के पीछे छिपी पूरी कहानी कौन बताएगा?
क्या बच्चा सवाल पूछता है?
क्या वह गलती के बाद फिर कोशिश करता है?
क्या वह स्वतंत्र रूप से सोच सकता है?
क्या वह दूसरों के साथ मिलकर काम कर सकता है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल परीक्षा पत्र नहीं दे सकता।
इसीलिए शनिवार को वार्षिक अधिगम संचिका, आत्मचिंतन दैनंदिनी, आत्ममूल्यांकन, सहपाठी मूल्यांकन और दक्षतामूलक आकलन का प्रावधान किया जाना चाहिए। वर्ष के अंत में उपलब्धियों के संकलन और व्यक्तिगत विकास योजना तैयार करने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
अंक उपलब्धि की तस्वीर दिखाते हैं; अधिगम संग्रह सीखने की यात्रा दिखाता है।
6. बच्चे का मन भी शिक्षा का हिस्सा है :
हम बच्चों से कहते हैं पढ़ो, अच्छा करो, परीक्षा में सफल हो। लेकिन कितनी बार उनसे पूछा जाता है आज तुम कैसा महसूस कर रहे हो?
परीक्षा का तनाव, असफलता का डर, साथियों का दबाव, भविष्य की चिंता और स्वयं को लेकर असमंजस भी बच्चे के जीवन का हिस्सा हैं।
इसलिए शनिवार को भावनात्मक बुद्धिमत्ता, तनाव प्रबंधन, परीक्षा पूर्व मानसिक तैयारी, ध्यान, प्राणायाम और जीवन कौशल जैसे आयाम शामिल होने चाहिए।
बच्चे को पढ़ाना जरूरी है; उसे संभालना भी उतना ही जरूरी है। शिक्षा तभी अधिक मानवीय होगी, जब वह बच्चे के मस्तिष्क के साथ उसके मन को भी जगह दे।
7. जब समाज भी शिक्षक बन जाए :
कक्षा की चार दीवारों के बाहर भी ज्ञान की एक बड़ी दुनिया है।
एक किसान, बच्चों को मिट्टी और खेती के बारे में जितना जीवंत बता सकता है, उतना शायद कोई अध्याय नहीं बता सकता। स्थानीय कारीगर कौशल का अर्थ समझा सकता है। उद्यमी बाजार, जोखिम और असफलता की वास्तविक कहानी सुना सकता है। कलाकार सृजन का आनंद दे सकता है।
अतः शनिवार को स्थानीय विशेषज्ञों, सफल पूर्व विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, किसानों, उद्यमियों, कलाकारों और प्रशासनिक अधिकारियों की सहभागिता की परिकल्पना की जानी चाहिए।
लेकिन समुदाय की भागीदारी केवल भाषण तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चे उनके साथ काम करें, सवाल पूछें और वास्तविक समस्याओं को समझें।
जब समाज कक्षा में आता है, तो किताबों के बाहर की दुनिया भी शिक्षक बन जाती है।
8. शिक्षक की भूमिका बदले बिना शनिवार नहीं बदलेगा :
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति फिर भी शिक्षक है। वही तय करेगा कि शनिवार केवल गतिविधि का दिन बनेगा या वास्तव में अधिगम का दिन।
यदि शिक्षक बच्चों को तैयार उत्तर देता रहेगा, तो नया कार्यक्रम भी पुराने ढर्रे पर चल सकता है। लेकिन यदि वह पूछे
तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?
क्या कोई दूसरा तरीका हो सकता है?
अगर यह काम नहीं किया, तो अगली बार क्या बदलोगे?
तो कक्षा का वातावरण बदलने लगेगा। शिक्षक तब केवल पढ़ाने वाला नहीं रहेगा। वह बच्चे की जिज्ञासा का साथी बन जाएगा।
नई शिक्षा के लिए जितनी जरूरी नई किताबें हैं, उतनी ही नई शिक्षक भूमिका भी।
9. गतिविधि की तस्वीर नहीं, सीखने की कहानी चाहिए :
आज किसी भी गतिविधि के बाद फोटो लेना आसान है। बच्चे मॉडल के साथ खड़े हैं। पोस्टर हाथ में है। समूह ने प्रस्तुति दी। कार्यक्रम पूरा हुआ।
लेकिन क्या वास्तव में सीखना भी हुआ? इसका उत्तर फोटो नहीं देती। फोटो यह साबित कर सकती है कि गतिविधि हुई; वह यह साबित नहीं कर सकती कि बच्चा सीख गया।
सीखने की कहानी तब बनेगी, जब विद्यार्थी बता सके
मैंने क्या देखा?
मैंने क्या किया?
मुझसे कहाँ गलती हुई?
मैंने क्या समझा?
अब मैं इसे कहाँ इस्तेमाल कर सकता हूँ?
यही गतिविधि से अनुभव और अनुभव से अधिगम की यात्रा है।
10. हर स्कूल में संसाधन समान नहीं होंगे :
यह पहल जितनी आकर्षक है, उतनी ही सावधानी भी माँगती है।
हर विद्यालय में प्रयोगशाला नहीं होगी। हर जगह इंटरनेट की समान सुविधा नहीं होगी। हर स्कूल को विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होंगे।
इसलिए अनुभवात्मक अधिगम को महँगे संसाधनों पर निर्भर नहीं किया जा सकता।
एक खेत प्रयोगशाला हो सकता है। स्थानीय बाजार गणित की कक्षा हो सकता है। गाँव का तालाब पर्यावरण अध्ययन का विषय हो सकता है। स्थानीय कारीगर कौशल का शिक्षक हो सकता है।
इस क्रियाकलाप में विद्यालय, समुदाय, अभिभावक साझेदारी तथा स्थानीय विशेषज्ञों की भागीदारी को महत्वपूर्ण मानता है।
संसाधन अलग हो सकते हैं; सीखने की संभावना नहीं।
11. सफलता की गिनती शनिवारों में नहीं होगी :
शनिवार को गतिविधि पूरे हो जाना कार्यक्रम की उपलब्धि होगी। लेकिन शिक्षा की उपलब्धि कुछ और होगी।
जब बच्चा अधिक सवाल पूछे।
जब वह किसी काम को स्वयं करने की कोशिश करे।
जब वह असफल होकर भी फिर प्रयास करे।
जब उसे अपने भविष्य की अधिक समझ हो।
जब वह किसी दूसरे की मदद करने लगे।
तभी बदलाव दिखाई देगा। गतिविधि के अपेक्षित परिणामों में विद्यार्थियों की सहभागिता एवं उपस्थिति में वृद्धि, सीखने के स्तर और दक्षताओं में सुधार, जीवन कौशल एवं सामाजिक भावनात्मक दक्षताओं का विकास, विद्यालय समुदाय साझेदारी तथा स्थानीय विशेषज्ञों की भागीदारी शामिल हैं। साथ ही, राज्य स्तर पर बस्ता मुक्त शनिवार का व्यावहारिक एवं कार्यान्वयन योग्य मॉडल विकसित करने की परिकल्पना की जानी चाहिए।
इसलिए असली सवाल होगा कितने शनिवार हुए? नहीं, कितने बच्चों में कुछ बदला?
शनिवार का असर सोमवार को दिखाई देना चाहिए
यह पूरी पहल की सबसे बड़ी कसौटी है। यदि शनिवार की गतिविधि शनिवार को ही खत्म हो जाती है, तो वह केवल एक कार्यक्रम है।
लेकिन यदि शनिवार का विज्ञान प्रयोग सोमवार की विज्ञान कक्षा में लौटता है, शनिवार का बजट गणित की समझ को गहरा करता है और शनिवार का सामुदायिक अनुभव नागरिकता की दृष्टि बदलता है, तब शनिवार पूरे विद्यालय की सीखने की संस्कृति में प्रवेश कर चुका है।
शनिवार तभी सफल होगा, जब उसका असर सोमवार की कक्षा में भी दिखाई दे।
तभी यह पाठ्यक्रम से अलग कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि पाठ्यक्रम और जीवन के बीच एक जीवंत पुल बन सकेगा।
अंततः सवाल शनिवार का नहीं, बच्चे के भविष्य का है l हम बार बार पूछते हैं बच्चा स्कूल में क्या सीख रहा है शायद अब एक और प्रश्न पूछने का समय है स्कूल से निकलते समय बच्चा कैसा इंसान बन रहा है?
क्या वह जिज्ञासु है?
क्या वह संवेदनशील है?
क्या वह असफलता से सीख सकता है?
क्या वह अपने निर्णयों की जिम्मेदारी ले सकता है?
क्या वह दूसरों के साथ मिलकर काम कर सकता है?
क्या वह नई तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग कर सकता है?
क्या वह अपने भविष्य को लेकर प्रश्न पूछ सकता है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर शिक्षा के केंद्र में आने लगें, तो शनिवार का अर्थ बदल जाएगा।
तब शनिवार केवल सप्ताह का छठा दिन नहीं रहेगा।वह स्कूल और जीवन के बीच खुला दरवाज़ा बन सकता है।
और शायद यही इस पहल की सबसे बड़ी संभावना है
शिक्षा की असली सफलता तब होगी, जब बच्चा स्कूल में सीखी बातों को जीवन में जीना शुरू कर दे।
भविष्य की पाठशाला किसी नए भवन में नहीं बनेगी। वह उस क्षण बनेगी, जब बच्चा किताब बंद करके अपने आसपास की दुनिया को ध्यान से देखेगा, कोई प्रश्न पूछेगा, स्वयं कुछ करने की कोशिश करेगा और फिर अपने अनुभव से कुछ नया समझेगा।
क्योंकि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल यह नहीं कि बच्चा कितना जानता है; बल्कि यह है कि वह अपने ज्ञान से जीवन को कितना बेहतर बना सकता है।
12. संदर्भ
शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा : बुनियादी अवस्था, 2022।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा : विद्यालयी शिक्षा, 2023।
शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, निपुण भारत : आधारभूत साक्षरता एवं संख्याज्ञान के लिए कार्यान्वयन दिशानिर्देश।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, परख : राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण, 2024।