डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
शिक्षा सुधार नीतियों से नहीं, उस कक्षा से शुरू होता है जहाँ हर बच्चा सीखने का अवसर पाता है।
1. शिक्षा परिवर्तन की असली प्रयोगशाला है कक्षा-कक्ष :
भारत में शिक्षा सुधार पर बहस अक्सर नई नीतियों, पाठ्यक्रमों, परीक्षाओं और परिणामों के चारों ओर घूमती है। लेकिन एक मूल प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है - शिक्षा का वास्तविक परिवर्तन आखिर होता कहाँ है? इसका उत्तर किसी मंत्रालय, किसी नीति दस्तावेज़ या किसी परीक्षा परिणाम में नहीं, बल्कि विद्यालय के उस कक्षा-कक्ष में छिपा है जहाँ प्रतिदिन सीखने की प्रक्रिया घटित होती है।
कल्पना कीजिए एक सामान्य विद्यालय की कक्षा। शिक्षक श्यामपट्ट पर पाठ समझा रहा है। कुछ विद्यार्थी उत्साहपूर्वक उत्तर दे रहे हैं। कुछ केवल लिख रहे हैं। अंतिम पंक्ति में बैठा एक बच्चा अब भी समझने की कोशिश कर रहा है कि पढ़ाया क्या जा रहा है। घंटी बजती है, पाठ समाप्त हो जाता है, लेकिन सीखना सबके लिए समान नहीं हो पाता।
यही दृश्य हमारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। शिक्षा की गुणवत्ता इस बात से तय नहीं होती कि शिक्षक ने कितना पढ़ाया; असली प्रश्न यह है कि कक्षा में उपस्थित प्रत्येक विद्यार्थी ने वास्तव में कितना सीखा।
यदि शिक्षा समाज परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली माध्यम है, तो उसका पहला प्रभाव कक्षा-कक्ष में दिखाई देना चाहिए।
याद रखना होगा, शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा परीक्षा केंद्र में नहीं, कक्षा-कक्ष में होती है।
2. प्रभावी कक्षा प्रबंधन का अर्थ नियंत्रण नहीं, सीखने की संस्कृति बनाना है :
लंबे समय तक कक्षा प्रबंधन को केवल अनुशासन बनाए रखने, विद्यार्थियों को नियंत्रित रखने और पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित समझा गया। लेकिन आधुनिक शिक्षा विज्ञान बताता है कि प्रभावी कक्षा प्रबंधन का असली मतलब नियंत्रण नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ सीखना स्वाभाविक, आनंददायक और सहभागी प्रक्रिया बन सके।
आज भी अनेक कक्षाओं में बच्चे गलत उत्तर देने के भय से प्रश्न नहीं पूछते। शिक्षक बोलता है, विद्यार्थी सुनते हैं और शिक्षा संवाद के बजाय एकतरफा प्रक्रिया बनकर रह जाती है।
एक आदर्श कक्षा वह नहीं जहाँ केवल शांति हो; आदर्श कक्षा वह है जहाँ जिज्ञासा जीवित हो, संवाद सक्रिय हो और विचार निरंतर विकसित हो रहे हों।
जहाँ कक्षा व्यवस्थित होती है, वहीं अधिगम गहरा, स्थायी और सार्थक बनता है।
लेकिन यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी शेष है - क्या कक्षा में उपस्थित हर बच्चा वास्तव में सीख रहा है?
3. शिक्षा तभी सफल है जब अंतिम पंक्ति का बच्चा भी सीख रहा हो :
शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक विद्यार्थी वास्तव में सीख सके। लंबे समय तक यह मान लिया गया कि सभी बच्चे समान गति से सीखते हैं, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
कुछ विद्यार्थी पहली बार में समझ जाते हैं। कुछ को अतिरिक्त उदाहरणों की जरूरत होती है। कुछ कई बार समझाने के बाद भी संघर्ष करते रहते हैं। यहीं से शैक्षिक असमानता जन्म लेती है।
आज अधिगम परिणाम आधारित शिक्षा यह स्पष्ट करती है कि शिक्षा तब सार्थक है जब प्रत्येक विद्यार्थी अपनी क्षमता, अपनी गति और अपनी आवश्यकता के अनुसार आगे बढ़ सके।
विद्यालयी शिक्षा के अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यदि शुरुआती अधिगम अंतर समय रहते दूर न किया जाए, तो यही अंतर आगे चलकर स्थायी शैक्षिक असमानता में बदल जाता है।
शिक्षा तब सफल नहीं होती जब कुछ बच्चे सीखते हैं; शिक्षा तब सफल होती है जब हर बच्चा सीखता है।
लेकिन हर कक्षा में कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं जिन्हें अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता होती है। यहीं उपचारात्मक शिक्षा की आवश्यकता सामने आती है।
4. जहाँ बच्चा पीछे छूटे, वहीं शिक्षक की वास्तविक जिम्मेदारी शुरू होती है :
परीक्षा परिणाम अक्सर यह बताते हैं कि अनेक विद्यार्थी मूलभूत अवधारणाएँ समझ ही नहीं पाए। गणित की आधारभूत समझ कमजोर होने के बावजूद अगला अध्याय शुरू हो जाता है। भाषा की कमजोरी के बावजूद विद्यार्थी अगली कक्षा तक पहुँच जाता है।
यहीं से अधिगम अंतर पैदा होता है, जो आगे चलकर आत्मविश्वास की कमी, शैक्षिक असमानता और सीखने से दूरी का कारण बनता है।
उपचारात्मक शिक्षा का उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों की कठिनाइयों को पहचानना और उन्हें लक्षित सहयोग देना है। सतत मूल्यांकन, अतिरिक्त अभ्यास, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और निरंतर प्रतिपुष्टि यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी बच्चा पीछे न रह जाए।
यदि एक भी बच्चा सीखने से वंचित रह गया, तो शिक्षा व्यवस्था अपनी नैतिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती।
5. बच्चे सुनकर नहीं, सक्रिय होकर सबसे बेहतर सीखते हैं :
आज भी अनेक कक्षाओं में शिक्षक बोलता रहता है और विद्यार्थी केवल सुनते रहते हैं। कुछ नोट्स लिखते हैं, कुछ ध्यान खो देते हैं और कुछ सीखने को केवल परीक्षा तक सीमित कर देते हैं।
लेकिन आधुनिक शिक्षा विज्ञान बताता है कि वास्तविक अधिगम तभी जन्म लेता है जब विद्यार्थी स्वयं सीखने की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनता है। प्रश्न करना, प्रयोग करना, समूह में कार्य करना, चर्चा करना और समाधान खोजना - यही असली शिक्षा है।
महान चिंतक बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था, मुझे शामिल कीजिए, मैं सीख जाऊँगा।
सक्रिय सहभागिता ही रचनात्मकता, तार्किक चिंतन, अभिव्यक्ति क्षमता और नेतृत्व कौशल विकसित करती है।
बच्चे तब सबसे अच्छा सीखते हैं जब वे सुनते कम और करते अधिक हैं।
6. नया शिक्षक केवल ज्ञानदाता नहीं, परिवर्तन का नेतृत्वकर्ता है :
समय बदल चुका है और शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। अब शिक्षक का कार्य केवल अध्यापन करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ बनाना है जहाँ विद्यार्थी स्वयं सीख सके।
एक प्रभावी शिक्षक तैयार उत्तर नहीं देता; वह विद्यार्थियों को सोचने, प्रश्न करने और समाधान खोजने की दिशा देता है। वह ऐसी कक्षा बनाता है जहाँ गलती करना असफलता नहीं, बल्कि सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाता है।
प्रख्यात शिक्षाविद मारिया मोंटेसरी ने कहा था, शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता तब है जब बच्चे स्वयं कार्य करने लगें।
आज का शिक्षक केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि संभावनाओं को दिशा देने वाला परिवर्तनकारी नेतृत्वकर्ता है।
श्रेष्ठ शिक्षक वह नहीं जो सबसे अधिक पढ़ाता है; श्रेष्ठ शिक्षक वह है जो बच्चों को स्वयं सीखने योग्य बना देता है।
7. नई शिक्षा व्यवस्था स्पष्ट संकेत दे रही है - अब कक्षा बदलनी होगी :
आज शिक्षा जगत विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण, समावेशी शिक्षा और विभेदित शिक्षण को प्राथमिकता दे रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि पारंपरिक व्याख्यान आधारित शिक्षण अब पर्याप्त नहीं है।
विद्यालयों को ऐसी कक्षाएँ विकसित करनी होंगी जहाँ शिक्षा केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया न होकर अनुभव, संवाद, चिंतन और आत्मविकास की प्रक्रिया बने।
नई शिक्षा का मूल मंत्र स्पष्ट है, कम पढ़ाइए, अधिक सीखने दीजिए।
8. राष्ट्र निर्माण की पहली ईंट कक्षा-कक्ष में रखी जाती है :
यदि शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय विकास का असली आधार बनाना है, तो विद्यालयों में प्रभावी कक्षा प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। अधिकतम अधिगम, उपचारात्मक शिक्षा, सक्रिय सहभागिता और शिक्षक की मार्गदर्शक भूमिका मिलकर ऐसी शिक्षण संस्कृति का निर्माण करते हैं जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी अपनी संपूर्ण क्षमता के साथ विकसित हो सकता है।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, शिक्षा का उद्देश्य कुशल और श्रेष्ठ मनुष्यों का निर्माण करना है।
किसी राष्ट्र की असली प्रगति उसकी ऊँची इमारतों, बड़ी अर्थव्यवस्था या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती; वह इस बात से मापी जाती है कि उसकी कक्षा में बैठा अंतिम बच्चा सीखने, सोचने और आगे बढ़ने का कितना अवसर प्राप्त कर रहा है।
अंततः, राष्ट्र निर्माण की पहली ईंट विद्यालय में रखी जाती है, लेकिन उसका वास्तविक आकार कक्षा-कक्ष के भीतर तय होता है। जिस दिन हर बच्चा सीखने लगेगा, उसी दिन शिक्षा सुधार का असली अर्थ सिद्ध होगा।
9. विचार के प्रमुख स्रोत :
भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय. राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020. नई दिल्ली, भारत.
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद. विद्यालयी शिक्षा में अधिगम परिणाम आधारित शिक्षण रूपरेखा. नई दिल्ली.
राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण. विद्यालयी अधिगम स्तर मूल्यांकन प्रतिवेदन. भारत सरकार.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन. शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षण तथा सतत विकास हेतु शिक्षा रूपरेखा. पेरिस.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष. बाल-अनुकूल विद्यालय तथा समावेशी अधिगम वातावरण संबंधी रूपरेखा. न्यूयॉर्क.
विश्व बैंक. शिक्षा के वादे को साकार करने हेतु वैश्विक अधिगम विकास प्रतिवेदन. वॉशिंगटन डी.सी.
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन. भविष्य की शिक्षा और कौशल विकास 2030 : विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण दृष्टिकोण. पेरिस.
जीन पियाजे. संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत एवं रचनावादी अधिगम दृष्टिकोण.
लेव वायगोत्स्की. सामाजिक अधिगम सिद्धांत एवं सहयोगात्मक शिक्षण अवधारणा.
मारिया मोंटेसरी. बाल-केंद्रित शिक्षा, स्व-निर्देशित अधिगम तथा शिक्षण स्वतंत्रता संबंधी विचार।