छत्तीसगढ़ का लोकपर्व, जो माटी, किसान, श्रम और प्रकृति के रिश्ते को नई पीढ़ी तथा पर्यावरणीय भविष्य से जोड़ता है
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
1. जब सावन धरती का उत्सव बन जाता है :
सावन की बारिश जब तपती धरती को छूती है, खेतों में धान की कोमल हरियाली उभरती है और माटी की सोंधी गंध गाँव की गलियों तक फैल जाती है, तब छत्तीसगढ़ का लोकजीवन एक ऐसे पर्व में प्रवेश करता है, जिसमें ऋतु, कृषि, आस्था और सामुदायिकता एक साथ दिखाई देती हैं।
यह है, हरेली।
सावन अमावस्या से जुड़ा यह कृषि आधारित लोकपर्व कृषि औजारों के सम्मान, पशुधन के प्रति कृतज्ञता, गेड़ी जैसे लोकखेल और विभिन्न स्थानीय लोकाचारों के माध्यम से मनाया जाता है।
लेकिन हरेली को केवल ‘हरियाली का त्योहार’ कहना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा। हरेली उस जीवन-दृष्टि की स्मृति है, जिसमें धरती को केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार माना गया।
आज, जब जलवायु परिवर्तन, जल-संकट, मृदा क्षरण और जैव-विविधता का प्रश्न कृषि और समाज के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है, हरेली अतीत की स्मृति भर नहीं रह जाती।वह एक समकालीन प्रश्न बन जाती है -
प्रकृति से हमने जो पाया है, उसके बदले हम उसे क्या लौटा रहे हैं?
2. माटी से मनुष्य का रिश्ता :
आधुनिक विकास की भाषा में भूमि ‘संसाधन’ है, जंगल ‘वन-संपदा’ और पानी ‘जल-संसाधन’। लोकजीवन की भाषा इससे कहीं अधिक आत्मीय है।
वहाँ भूमि माटी है। खेत केवल उत्पादन का क्षेत्र नहीं, कर्मभूमि है। पशुधन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, जीवन-व्यवस्था का सहभागी है। और वर्षा केवल मौसम नहीं, आशा है। हरेली इसी संबंध बोध का उत्सव है।
कृषि औजारों का सम्मान इस पर्व की महत्वपूर्ण परंपरा है। हल, नांगर, कुदाली, फावड़ा और खेती में प्रयुक्त अन्य उपकरण किसान के लिए केवल वस्तुएँ नहीं होते; उनमें उसका श्रम, उसकी आजीविका और उसके परिवार की आशाएँ जुड़ी होती हैं।
इसलिए कृषि औजारों का सम्मान केवल अनुष्ठान नहीं - अन्न, श्रम और धरती के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। कृषि केवल उत्पादन नहीं, संबंध है।
3. हल से आगे: श्रम का सम्मान
कृषि की दुनिया तेजी से बदल रही है। हल की जगह ट्रैक्टर हैं। पारंपरिक औजारों के साथ आधुनिक मशीनें हैं। सिंचाई की नई तकनीकें खेतों तक पहुँच रही हैं। ड्रोन, सेंसर, उपग्रह-आधारित सेवाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता खेती की नई संभावनाएँ खोल रही हैं।
यह परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन तकनीकी प्रगति के बीच एक मानवीय प्रश्न अनिवार्य है- क्या कृषि आधुनिक होते हुए भी किसान-केंद्रित बनी हुई है?
तकनीक दक्षता बढ़ा सकती है, श्रम कम कर सकती है और उत्पादन की संभावनाएँ बढ़ा सकती है। लेकिन वह कृषि की मानवीय आत्मा का विकल्प नहीं हो सकती।
क्योंकि खेत में केवल बीज नहीं बोया जाता। वहाँ किसान की आशा भी बोई जाती है।
तकनीक खेती की दक्षता बढ़ा सकती है; कृषि की आत्मा किसान, श्रम और मिट्टी के रिश्ते में रहती है। हरेली आधुनिकता का विरोध नहीं करती। वह केवल यह याद दिलाती है -
प्रगति करो, लेकिन उस हाथ को मत भूलो जो धरती को अन्न में बदलता है।
4. बैल से ट्रैक्टर तक: बदली खेती, वही संवेदना
हरेली में पशुधन के प्रति सम्मान ग्रामीण जीवन की उस कृषि-व्यवस्था की स्मृति है, जिसमें मनुष्य, पशु और खेत एक साझा जीवन चक्र के हिस्से थे।
आज अनेक खेतों में बैल की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। यह बदलाव समय और तकनीकी विकास का स्वाभाविक हिस्सा है।
लेकिन प्रश्न बैल बनाम ट्रैक्टर का नहीं है। प्रश्न यह है - क्या हमारी प्रगति हमें अधिक संवेदनशील भी बना रही है? कृषि केवल उत्पादन की प्रक्रिया नहीं। वह मनुष्य, पशु, मिट्टी, जल, बीज और मौसम के बीच संबंधों की एक जीवंत व्यवस्था है।
मशीनें बदल सकती हैं। तकनीक बदल सकती है। कृषि पद्धतियाँ बदल सकती हैं। लेकिन संवेदना नहीं बदलनी चाहिए।
5. गेड़ी: खेल नहीं, पीढ़ियों की स्मृति
हरेली की गेड़ी इस पर्व को खेत और कृषि-औजारों से आगे ले जाकर बचपन और सामुदायिक जीवन से जोड़ती है।
बाँस की गेड़ी पर चढ़ते बच्चे, संतुलन साधते युवा और उत्सव में शामिल समुदाय, यह केवल मनोरंजन का दृश्य नहीं; यह जीवित लोकस्मृति का हिस्सा है। गेड़ी शरीर को संतुलन सिखाती है, लेकिन उससे भी अधिक वह पीढ़ियों को संस्कृति से जोड़ती है।
आज बच्चों का बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया में समय बिताता है। ऐसे समय में गेड़ी एक सहज प्रश्न सामने रखती है - क्या विकास का अर्थ यह भी है कि बचपन प्रकृति, खुले आकाश और सामुदायिक खेलों से दूर होता जाए?
हरेली का उत्तर सरल हो सकता है, बचपन को फिर से मिट्टी से जोड़ना होगा। लोकखेल केवल मनोरंजन नहीं होते। वे शरीर, साहस, सहभागिता और सामुदायिक आत्मविश्वास के अनौपचारिक विद्यालय होते हैं।
इस अर्थ में गेड़ी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती हुई सांस्कृतिक स्मृति है।
6. लोकपर्व से लोकसमाज तक: हरेली की सामुदायिक शक्ति
हरेली की शक्ति केवल उसके अनुष्ठानों में नहीं, उसकी सामूहिकता में है। इसमें किसान है, कारीगर है, पशुपालक है, बच्चा है, युवा है, महिला है और बुजुर्ग भी।
जब कोई पर्व समाज के विभिन्न वर्गों को साझा अनुभव में जोड़ता है, तब वह केवल उत्सव नहीं रहता; वह सामाजिक संबंधों को पुनर्जीवित करने वाला माध्यम बन जाता है।
आज समाज तेजी से शहरी और डिजिटल हो रहा है। संचार के साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रत्यक्ष सामाजिक संपर्क के अवसर कई जगह घट रहे हैं।
ऐसे समय में लोकपर्व सामुदायिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लोकसंस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं; वह समाज की साझा पहचान है।
हरेली इस पहचान को हर वर्ष नए सिरे से जीवित करती है।
7. लोकपरंपरा से लोकज्ञान तक :
हरेली हमें लोकज्ञान की ओर देखने का अवसर भी देती है। प्रकृति के साथ लंबे सह-अस्तित्व से समुदायों ने मौसम, मिट्टी, जल, बीज, वनस्पति और कृषि से संबंधित अनेक अनुभव अर्जित किए हैं। इन अनुभवों का स्वरूप क्षेत्र दर क्षेत्र अलग हो सकता है और उनमें लोकविश्वास भी जुड़े हो सकते हैं।
इसलिए लोकपरंपरा को समझने के लिए दो अतियों से बचना होगा। न तो हर परंपरा को बिना जाँच के वैज्ञानिक सत्य मानना उचित है, न हर लोकविश्वास को बिना समझे अंधविश्वास कह देना।
लोकज्ञान अनुभव से जन्मता है; विज्ञान उस अनुभव की व्यवस्थित जाँच करता है।
किसी उपयोगी पारंपरिक अनुभव का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है। उसका दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। उपयोगी ज्ञान को नई तकनीक और आधुनिक शोध के साथ जोड़ा जा सकता है।
और जहाँ कोई मान्यता वैज्ञानिक कसौटी पर खरी न उतरे, वहाँ उसे सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझा जा सकता है, वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं। सम्मान भी, विवेक भी।
8. लोकज्ञान और विज्ञान का मिलन :
भविष्य की टिकाऊ कृषि के लिए यही संतुलन निर्णायक हो सकता है। एक ओर ऐसी आधुनिकता से बचना होगा, जो स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को अप्रासंगिक समझे।
दूसरी ओर ऐसी परंपरावादिता से भी बचना होगा, जो हर पुराने व्यवहार को बिना जाँच के वैज्ञानिक सत्य मान ले। इन दोनों के बीच रास्ता है- संवाद।
किसान मौसम के संकेतों को पढ़ता आया है। वह मिट्टी की बनावट पहचानता आया है। उसने बीज बचाए हैं। उसने जलस्रोतों के साथ जीवन का संतुलन बनाया है।
आधुनिक विज्ञान इन अनुभवों को मापने, परखने और नए संदर्भों में विकसित करने की क्षमता रखता है।
इसलिए भविष्य की कृषि न तो केवल अतीत की पुनरावृत्ति होगी, न केवल प्रयोगशाला की तकनीक। वह होगी - लोकबुद्धि और वैज्ञानिक विवेक का संतुलित संगम।
9. परंपरा तभी जीवित है, जब वह भविष्य से संवाद करे :
परंपरा का अर्थ अतीत को ज्यों का त्यों दोहराते रहना नहीं है। जीवित परंपरा वह है जो अपने मूल्यों को बचाते हुए समय के साथ नए अर्थ ग्रहण करे।
हरेली के मूल में प्रकृति के प्रति सम्मान, किसान के श्रम के प्रति कृतज्ञता, कृषि के प्रति संवेदना, पशुधन के प्रति आत्मीयता और समुदाय के प्रति जिम्मेदारी जैसे मूल्य दिखाई देते हैं।
इन मूल्यों को आज की परिस्थितियों में नए रूप में जीना ही हरेली को जीवंत बनाएगा। आधुनिक कृषि-तकनीक और पारंपरिक कृषि-ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
परंपरा को संग्रहालय नहीं, संवाद चाहिए।
जो परंपरा प्रश्नों से डरती है, वह धीरे-धीरे जड़ हो जाती है। जो परंपरा नए समय से संवाद करती है, वह भविष्य की शक्ति बन जाती है।
10. हरेली से हरित भविष्य तक: परंपरा का नया अर्थ
हरेली का सबसे समकालीन अर्थ पर्यावरणीय चेतना में दिखाई देता है।
जलवायु परिवर्तन कृषि के सामने नई चुनौतियाँ रख रहा है। अनियमित वर्षा, तापमान में बदलाव, जल-संकट, मृदा क्षरण और जैव-विविधता पर दबाव खेती के भविष्य से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं।
इनका समाधान केवल तकनीक से नहीं होगा आवश्यकता है -
व्यवहार में परिवर्तन की,
कृषि-पद्धतियों में सुधार की,
नीतिगत समर्थन की,
और सामाजिक चेतना की।
हरेली प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की सांस्कृतिक स्मृति देती है। अब उस कृतज्ञता को संरक्षण के व्यवहार में बदलने की आवश्यकता है।
हरियाली केवल खेतों में दिखाई दे, इतना पर्याप्त नहीं; हरियाली हमारे निर्णयों में भी दिखाई देनी चाहिए।
यही हरेली का नया अर्थ हो सकता है -
पूजा से संरक्षण तक।
परंपरा से संकल्प तक।
हरियाली के प्रतीक से हरित व्यवहार तक।
11. एक पर्व, एक पौधा, एक भविष्य :
किसी बड़े विचार की शक्ति तब बढ़ती है, जब वह छोटे व्यवहार में उतर सके। हरेली को पर्यावरणीय कार्रवाई से जोड़ने का एक सरल सूत्र हो सकता है—
एक पर्व - एक पौधा।
हर परिवार हरेली पर एक स्थानीय प्रजाति का पौधा लगाए। हर गाँव अपने किसी पुराने तालाब या जलस्रोत की जिम्मेदारी ले। हर विद्यालय अपने आसपास की जैव-विविधता का अभिलेख बनाए।
हर किसान मिट्टी के स्वास्थ्य को कृषि-योजना का हिस्सा बनाए। हर बच्चा किसी किसान, कारीगर या बुजुर्ग से स्थानीय कृषि-परंपरा की एक कहानी सुने। और अगली हरेली पर एक सरल प्रश्न पूछा जाए -
पिछली हरेली का लगाया हुआ पौधा कहाँ है? यहीं उत्सव व्यवहार में बदलता है। एक पौधा आज की हरियाली नहीं; कल की छाया है।
12. नई पीढ़ी हरेली से क्या सीखे? :
नई पीढ़ी को हरेली के बारे में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि इस दिन कृषि-औजारों का सम्मान होता है और गेड़ी खेली जाती है।
उसे यह भी समझना होगा -
मिट्टी जीवित तंत्र है।
जल सीमित है।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं हैं।
बीज केवल उत्पादन नहीं, भविष्य की संभावना हैं।
पशु केवल संसाधन नहीं, सहजीवन के साथी हैं।
विद्यालय हरेली को जीवंत पर्यावरण शिक्षा का माध्यम बना सकते हैं। विद्यार्थी स्थानीय तालाबों का अध्ययन कर सकते हैं, जैव-विविधता का अभिलेख बना सकते हैं, किसानों से संवाद कर सकते हैं, पारंपरिक कृषि-औजारों का दस्तावेजीकरण कर सकते हैं और अपने गाँव या शहर के हरित क्षेत्र का मानचित्र तैयार कर सकते हैं।
तब संस्कृति केवल पढ़ाई नहीं जाएगी - जी जाएगी।
किसी लोकपर्व की सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब वह नई पीढ़ी को केवल अपनी जड़ों की जानकारी नहीं देता, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी भी सौंपता है।
13. हरेली का असली प्रश्न :
हरेली कोई जटिल दर्शन नहीं देती। वह एक सरल प्रश्न हमारे सामने रखती है -
धरती से हमने क्या लिया, और उसके बदले उसे क्या लौटाया?
यही प्रश्न हरेली को एक दिन के उत्सव से उठाकर जीवन-दृष्टि तक ले जाता है। हमने प्रकृति को संसाधन माना।अब समय है उसे संबंध की तरह देखने का। हमने विकास को उत्पादन से मापा। अब समय है उसे जीवन की गुणवत्ता और स्थायित्व से मापने का।
हमने जंगलों को संपदा समझा। अब समय है उन्हें जीवन-तंत्र के रूप में देखने का। हरेली इसी दृष्टि-परिवर्तन की सांस्कृतिक भूमिका निभा सकती है।
14. जब उत्सव संकल्प बन जाए :
किसी पर्व की वास्तविक शक्ति उसकी भव्यता में नहीं, उसके बाद बची हुई चेतना में होती है।
यदि हरेली के बाद खेत वही रहें, जलस्रोत उसी संकट से जूझते रहें, मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता रहे और हरियाली केवल उत्सव की सजावट तक सीमित रहे, तो केवल उत्सव पर्याप्त नहीं है।
लेकिन यदि हरेली -
एक पौधा बचाए,
एक तालाब बचाए,
एक बीज बचाए,
एक किसान की परंपरागत समझ को दर्ज करे,
एक बच्चे को प्रकृति के करीब ले जाए -तो यह पर्व अपने सांस्कृतिक दायरे से कहीं आगे निकल जाता है। तभी उत्सव संकल्प बनता है। और जब संकल्प व्यवहार बन जाए, तभी संस्कृति भविष्य को प्रभावित करती है।
15. हरेली की हरियाली, भविष्य की जिम्मेदारी :
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हरेली कितनी धूमधाम से मनाई गई। असली प्रश्न यह है -
हरेली के बाद हमारी धरती कितनी अधिक हरी हुई?
हमारी खेती कितनी अधिक टिकाऊ हुई?
हमारा जल कितना अधिक सुरक्षित हुआ?
हमारी जैव-विविधता कितनी अधिक संरक्षित हुई?
और हमारी चेतना प्रकृति के प्रति कितनी अधिक संवेदनशील हुई?
यही वह बिंदु है जहाँ पर्व उत्सव से आगे बढ़कर दृष्टि बन जाता है। हरेली हमें अतीत में कैद नहीं करती। वह अतीत से शक्ति लेकर भविष्य की ओर देखने का अवसर देती है।
परंपरा उसका आधार है।
प्रकृति उसका विस्तार है।
किसान उसकी आत्मा है।
नई पीढ़ी उसकी आशा है।
और भविष्य उसकी जिम्मेदारी।
इसलिए हरेली को केवल मनाएँ नहीं -
उसे जिएँ।
माटी में।
जल में।
पेड़ों में।
खेती में।
खेल में।
लोकस्मृति में।
और अपने दैनिक व्यवहार में।
क्योंकि हरेली तब पूर्ण होगी, जब उसकी हरियाली खेतों से निकलकर हमारी चेतना में उतरेगी। तभी परंपरा सचमुच भविष्य की हरियाली लिखेगी।
16. संदर्भ एवं आधार-स्रोत :
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संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ)। रोम: संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन।
भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए एकीकृत मृदा एवं जल प्रबंधन आवश्यक। रोम: संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन।संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ)। (2023)।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ)। रोम: संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन।
हरेली तिहार एवं छत्तीसगढ़ की कृषि-लोकपरंपराओं से संबंधित आधिकारिक सामग्री। रायपुर: छत्तीसगढ़ शासन।
समाचार संकलन : अनिल बघेल ABN